Site icon CHANNEL009

“अगर मैं मरूं तो…” – गाज़ा की युवा फोटो जर्नलिस्ट की आखिरी ख्वाहिश

गाज़ा की युवा फोटो जर्नलिस्ट

गाज़ा — 25 वर्षीय साहसी और समर्पित फोटो जर्नलिस्ट फातिमा हसौना की ज़िंदगी इजरायली हवाई हमले में खत्म हो गई। वह उन लोगों में से थीं, जो युद्ध की त्रासदी को कैमरे में कैद कर पूरी दुनिया को सच दिखाने की कोशिश कर रही थीं।

“मेरी मौत गूंजनी चाहिए…”

अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले, फातिमा ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट शेयर की थी, जिसमें उन्होंने लिखा:
“अगर मेरी मौत हो, तो ऐसी हो जो गूंज बनकर रह जाए। मैं बस एक आंकड़ा नहीं बनना चाहती। मैं एक ऐसी तस्वीर छोड़ना चाहती हूं जिसे वक्त भी मिटा न सके।”

हमले में पूरा परिवार उजड़ गया

द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, फातिमा की जल्द ही शादी होने वाली थी। लेकिन शादी से पहले ही उनके घर पर मिसाइल गिराई गई जिसमें उनके 10 परिजन, जिनमें गर्भवती बहन भी शामिल थीं, मारे गए।

गाज़ा के दर्द की दस्तावेज़ थीं फातिमा की तस्वीरें

फातिमा ने गाज़ा में तबाही, पलायन, टूटते घरों और अपने 11 करीबी रिश्तेदारों की मौत को कैमरे में दर्ज किया था। उनके काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया और ईरानी निर्देशक सेपीदे फारसी ने उनकी विजुअल स्टोरीज़ को मिलाकर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई —
“Put Your Soul on Your Hand and Walk”, जिसे कान्स फिल्म फेस्टिवल से जुड़ी एक स्वतंत्र स्क्रीनिंग में दिखाया जाना था।

टारगेट किया गया?

फिल्म निर्माता फारसी को शक है कि फातिमा को सिर्फ पत्रकार होने की वजह से निशाना बनाया गया। उनका मानना है कि फातिमा की डॉक्यूमेंट्री में भागीदारी और विश्व को सच्चाई दिखाने की कोशिश उनकी मौत की वजह बनी।

गाज़ा में मीडिया पर हमले की घटनाएं बढ़ रही हैं — अब तक करीब 170 से ज्यादा पत्रकार मारे जा चुके हैं। यह संख्या गाज़ा को पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में से एक बना चुकी है।

जंग के बीच उम्मीद की कहानी

7 अक्टूबर 2023 से लेकर अब तक गाज़ा में 51,000 से अधिक मौतें हो चुकी हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। मार्च 2024 में युद्धविराम टूटने के बाद से हालात और बिगड़े हैं।

फातिमा की कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि पूरे गाज़ा की आवाज़ है — जो दुनिया तक अपनी चीख पहुंचाना चाहता है, कैमरे के पीछे से नहीं, सीधे दिलों में।

Exit mobile version