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अमेरिका में खारिज हुए भारत के आम! 15 शिपमेंट रुके, करोड़ों का झटका

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नई दिल्ली / वॉशिंगटन – भारत से अमेरिका भेजे गए 15 आमों के शिपमेंट को अमेरिकी सीमा सुरक्षा अधिकारियों ने दस्तावेजों की गड़बड़ी के चलते खारिज कर दिया है। इस घटना से भारतीय निर्यातकों को करीब 5 लाख डॉलर (लगभग 4.2 करोड़ रुपये) का नुकसान हुआ है। यह विवाद भारत-अमेरिका के बीच जारी व्यापार वार्ता के माहौल को भी प्रभावित कर सकता है।


PPQ203 दस्तावेज बना विवाद का केंद्र

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इन शिपमेंट्स में PPQ203 नामक एक आवश्यक दस्तावेज में त्रुटि पाई गई। यह दस्तावेज यह प्रमाणित करता है कि फल कीट नियंत्रण के लिए विकिरण उपचार (Irradiation Treatment) से गुजर चुके हैं। यह प्रक्रिया नवी मुंबई की एक अधिकृत सुविधा में होती है, जहां USDA (अमेरिकी कृषि विभाग) के अधिकारी भी मौजूद रहते हैं।

हालांकि भारतीय निर्यातकों का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार पूरी की गई थीं और बिना सही दस्तावेजों के तो शिपमेंट एयरपोर्ट पर लोड ही नहीं किया जा सकता। उनका आरोप है कि गलती संभवतः कागजी प्रक्रिया में अमेरिका की ओर से हुई है।


दो विकल्प, लेकिन कोई राहत नहीं

अमेरिकी कस्टम अधिकारियों ने निर्यातकों को दो विकल्प दिए:

  1. आमों को स्थानीय रूप से नष्ट किया जाए।

  2. या फिर उन्हें भारत वापस भेजा जाए।

लेकिन चूंकि आम जल्दी खराब हो जाने वाला फल है और रिवर्स शिपिंग की लागत बहुत अधिक होती है, इसलिए सभी निर्यातकों ने स्थानीय स्तर पर आम को नष्ट करने का फैसला किया। एक निर्यातक ने कहा:

“गलती हमारी नहीं थी, फिर भी हमें कीमत चुकानी पड़ी।”


व्यापार वार्ता पर असर संभव

यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापक व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। भारत जहां कपड़ा, चमड़ा, झींगा, रसायन और अंगूर जैसे उत्पादों पर शुल्क में राहत चाहता है, वहीं अमेरिका औद्योगिक सामान, वाइन, डेयरी और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बाजार पहुंच की मांग कर रहा है।

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि भारत ने ‘नो टैरिफ डील’ का प्रस्ताव रखा है, जबकि भारत ने इसे “विन-विन सौदा” बताया है।


निष्कर्ष: आम की वजह से खट्टे हो सकते हैं रिश्ते?

दस्तावेजी त्रुटि से खारिज हुए इन शिपमेंट्स ने सिर्फ निर्यातकों को आर्थिक नुकसान ही नहीं पहुँचाया, बल्कि यह प्रकरण दोनों देशों के बीच व्यापारिक पारदर्शिता और विश्वास पर भी सवाल खड़े करता है। अगर जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो यह मामूली गलती बड़े द्विपक्षीय समझौते के रास्ते में बाधा बन सकती है।

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