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इस्तांबुल में पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून को लेकर झड़पें, कई गिरफ्तार

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इस्तांबुल:
सोमवार को इस्तांबुल की सड़कों पर तनाव भड़क गया जब पुलिस को एक विवादास्पद कार्टून की वजह से भड़की भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और रबर की गोलियों का इस्तेमाल करना पड़ा।

यह विवाद तुर्की की मशहूर व्यंग्य पत्रिका LeMan के जून 2025 अंक में प्रकाशित एक कार्टून को लेकर शुरू हुआ, जिसमें कथित तौर पर पैग़ंबर मोहम्मद का अपमान करने का आरोप लगाया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए इस्तांबुल के मुख्य अभियोजक ने पत्रिका के संपादकों की गिरफ्तारी के आदेश दे दिए।


🖼️ कार्टून में क्या था?

सोशल मीडिया पर वायरल हुए उस ब्लैक-एंड-व्हाइट चित्र में दो पात्र हवा में उड़ते दिखाई दे रहे हैं, जिनमें एक कहता है,
“सलाम अलैकुम, मैं मोहम्मद हूं,”
जिस पर दूसरा जवाब देता है,
“अलैकुम सलाम, मैं मूसा हूं।”

हालांकि पत्रिका के संपादक तुनचाय अकगुन ने फोन पर बताया कि यह कार्टून पैग़ंबर मोहम्मद को नहीं, बल्कि एक फिक्शनल पात्र को दर्शाता है जिसका नाम मोहम्मद रखा गया था — जो इज़राइली हमलों में मारे गए मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करता है।

“200 मिलियन से ज़्यादा लोग इस्लामी दुनिया में मोहम्मद नाम से जाने जाते हैं। इसका धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने से कोई संबंध नहीं है।”


🔥 भीड़ का आक्रोश और झड़पें

जैसे ही गिरफ्तारी की खबर फैली, दर्जनों लोगों ने LeMan से जुड़े एक पब पर हमला कर दिया, जिससे 250 से अधिक लोगों की भीड़ और पुलिस के बीच टकराव शुरू हो गया।

गृह मंत्री अली येरलिकाया ने X (पूर्व ट्विटर) पर पुष्टि की कि

साथ ही, LeMan के कार्यालयों को भी सील कर दिया गया और अन्य संपादकीय कर्मचारियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है।


📢 LeMan की प्रतिक्रिया

पत्रिका ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि कार्टून को जानबूझकर गलत तरीके से पेश किया गया, ताकि इसे एक सांप्रदायिक भड़कावे में बदला जा सके।

“कार्टूनिस्ट ने केवल इज़राइल द्वारा मारे गए एक निर्दोष मुसलमान की पीड़ा दिखाने का प्रयास किया था। उसका उद्देश्य कभी धार्मिक भावनाओं का अपमान करना नहीं था।”


⚖️ सरकार और धार्मिक नेताओं की कड़ी प्रतिक्रिया


🧠 संपादक की आशंका: ‘चार्ली हेब्दो’ दोहराया जा रहा है

LeMan के संपादक ने आरोप लगाया कि यह पूरी कार्रवाई एक पूर्व नियोजित साजिश है। उन्होंने फ्रांस की ‘Charlie Hebdo’ पत्रिका के मामले की याद दिलाई, जिसके दफ्तर पर 2015 में हमला हुआ था।

“हमें उसी तरह बदनाम करने और कुचलने की कोशिश हो रही है।”


निष्कर्ष

इस्तांबुल की यह घटना बताती है कि व्यंग्य और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन बनाना कितना संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचना और फिर उस पर सरकार की सख्ती — यह टकराव एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक सवाल बन गया है।

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