तेहरान: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने शनिवार को अमेरिका को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि उनका देश अपने परमाणु अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा, चाहे कितना भी दबाव क्यों न हो। उन्होंने यह बयान ऐसे समय में दिया जब तेहरान और वाशिंगटन के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर तनाव फिर से तेज होता दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रपति पेजेशकियान ने यह बातें नौसेना अधिकारियों को संबोधित करते हुए कही, जिसका प्रसारण राष्ट्रीय टेलीविजन पर किया गया। उन्होंने कहा, “हम बातचीत के लिए तैयार हैं और यह प्रक्रिया जारी रहेगी, लेकिन हम किसी भी तरह की धमकी या बल प्रयोग को स्वीकार नहीं करेंगे। हमारा रास्ता शांतिपूर्ण है, पर अगर हमें मजबूर किया गया, तो हम अपने वैज्ञानिक और परमाणु अधिकारों की रक्षा करने से पीछे नहीं हटेंगे।”
वार्ता तकनीकी स्तर पर जारी
ईरानी राष्ट्रपति के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत अब तकनीकी स्तर तक पहुँच गई है। दोनों देशों के विशेषज्ञ संभावित परमाणु समझौते के व्यवहारिक पक्षों पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि, सबसे बड़ा विवाद अब भी ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को लेकर बना हुआ है।
ईरान का दावा है कि उसका यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह से वैध और शांतिपूर्ण है, जबकि अमेरिका इस प्रक्रिया को सीमित करने या रोकने की मांग कर रहा है, ताकि परमाणु हथियार निर्माण की आशंका को टाला जा सके।
ट्रंप की धमकी और तेहरान की प्रतिक्रिया
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि अगर कोई समझौता नहीं होता, तो अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बना सकता है। इसके साथ ही ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान को वार्ता के दौरान एक नया प्रस्ताव दिया गया है, लेकिन उन्होंने उसके ब्योरे नहीं बताए।
ईरान ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर सैन्य कार्रवाई की गई, तो वह यूरेनियम संवर्धन की दर को और बढ़ा सकता है — एक ऐसा कदम जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय परमाणु हथियार की दिशा में खतरनाक संकेत मान सकता है।
ईरान की पारदर्शिता का दावा
ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन के प्रमुख मोहम्मद इस्लाम ने दोहराया कि उनका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण है और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में चल रहा है। उन्होंने कहा, “ईरान की पारदर्शिता किसी से कम नहीं है। अकेले 2024 में ही IAEA ने हमारे परमाणु स्थलों का 450 से अधिक बार निरीक्षण किया है।”
निष्कर्ष
ईरान के इस सख्त रुख ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर इस मुद्दे को संवेदनशील बना दिया है। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश किसी समझौते की ओर बढ़ते हैं या फिर यह टकराव किसी गंभीर मोड़ पर पहुँचता है।

