ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष के बीच तेहरान और अन्य शहरों में फंसे भारतीय छात्र भारी दहशत के साए में जी रहे हैं। शाहिद बेहेश्ती यूनिवर्सिटी, ईरान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज और केर्मान मेडिकल यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार से तत्काल निकासी की अपील की है।
🔴 “रात 2:30 बजे धमाकों से नींद टूटी” – छात्र इमतिसाल मोहिदीन
22 वर्षीय इमतिसाल मोहिदीन, जो जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले से हैं और शाहिद बेहेश्ती यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस के छात्र हैं, बताते हैं:
“रात के 2:30 बजे ज़ोरदार धमाके हुए। हम भागकर बेसमेंट में छिप गए। पिछले तीन दिनों से ठीक से नींद नहीं आई है।”
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में लगभग 350 भारतीय छात्र हैं, जो सुरक्षा कारणों से बेसमेंट या अपार्टमेंट्स के निचले हिस्सों में छिपे हुए हैं। कक्षाएं स्थगित कर दी गई हैं और बाहर निकलना बेहद जोखिम भरा हो गया है।
🟠 “हम डॉक्टर बनने आए थे, अब तो बस जिंदा बचने की सोच है”
केर्मान मेडिकल यूनिवर्सिटी के छात्र फैज़ान नबी, जो श्रीनगर से हैं, ने ANI से बातचीत में बताया:
“हमारे शहर में अब तक स्थिति थोड़ी बेहतर थी, लेकिन अब डर तेजी से फैल रहा है। आज हमने गोलियों की आवाजें सुनीं। हमें कहा गया है कि कम से कम 3-4 दिन का पानी और राशन इकट्ठा कर लें।”
फैज़ान ने यह भी बताया कि इंटरनेट कनेक्टिविटी बेहद धीमी है और परिवार के साथ संवाद करना मुश्किल हो गया है।
🟡 “सबसे डरावनी थी पहली रात” – मिधात, चौथे वर्ष की छात्रा
मिधात, जो सोपोर (जम्मू-कश्मीर) की रहने वाली हैं और ईरान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज में पढ़ती हैं, ने कहा:
“हमारी यूनिवर्सिटी के पास ही धमाके हुए थे। पहली रात सबसे भयानक थी। आज भी हम सब कमरे में बंद हैं। कोई नहीं जानता बाहर क्या हो रहा है। अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई विशेष मदद नहीं मिली है।”
🚨 क्या कह रही है भारतीय सरकार?
भारत सरकार ने पहले ही संकेत दिए हैं कि वह ईरान में फंसे करीब 10,000 भारतीय नागरिकों, जिनमें बड़ी संख्या में छात्र हैं, के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन की तैयारी कर रही है। ईरान ने ज़मीनी सीमा से निकासी की अनुमति दी है, जबकि हवाई अड्डे बंद हैं।
📌 निष्कर्ष: हर पल मौत का खतरा, अपनों की उम्मीद
ईरान में फंसे भारतीय छात्रों की ये अपील न केवल एक मानवीय संकट को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि युद्ध का असर केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि विदेशों में पढ़ रहे हमारे युवाओं पर भी पड़ रहा है।
छात्रों की एक ही मांग है – “हमें सुरक्षित भारत वापस लाया जाए।”

