
अदालत ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि पूर्व सूचना आयुक्त द्वारा दिया गया आदेश ईमानदारी और अपने कर्तव्यों के निर्वहन के तहत दिया गया था। इसके अलावा, उन्हें जुर्माना लगाने से पहले कोई नोटिस भी नहीं भेजा गया था, इसलिए यह आदेश रद्द किया जाता है।
मामला क्या था?
भोपाल के निवासी नीरज निगम ने कोर्ट में याचिका लगाई थी। उन्होंने बताया कि उन्होंने 26 मार्च 2019 को सूचना के अधिकार (RTI) के तहत आवेदन किया था, लेकिन 30 दिनों में उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई। बाद में उन्हें एक पत्र भेजा गया जिसमें कहा गया कि ₹2,12,334 जमा करके ही जानकारी दी जाएगी।
अपीलें और कार्रवाई
नीरज निगम ने पहले प्रथम अपील दायर की, जिसमें उन्होंने कहा कि नियम के मुताबिक 30 दिन में जानकारी निशुल्क दी जानी चाहिए। लेकिन उनकी अपील खारिज हो गई। फिर उन्होंने द्वितीय अपील सूचना आयोग में की, जिसे अरविंद कुमार शुक्ला ने भी खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।
अब क्या हुआ?
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना कि पूर्व सूचना आयुक्त ने अपना कार्य नियम के अनुसार किया था। इसलिए उन पर लगाया गया जुर्माना हटाया जाता है।
👉 इस फैसले से यह साफ हो गया कि अगर कोई अधिकारी ईमानदारी से अपने कर्तव्य निभाता है, तो उसे बिना उचित प्रक्रिया के दंडित नहीं किया जा सकता।
