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कैसे बदले ईरान-इज़राइल के रिश्ते: दोस्ती से दुश्मनी तक की पूरी कहानी

israel-iran war

नई दिल्ली/तेहरान/यरुशलम: कभी एक-दूसरे के सहयोगी रहे ईरान और इज़राइल आज कट्टर दुश्मन बन चुके हैं। 1948 में जब इज़राइल की नींव रखी गई, तब तुर्की के बाद ईरान वह दूसरा मुस्लिम बहुल देश था जिसने उसे मान्यता दी थी। लेकिन आज हालात बिल्कुल विपरीत हैं—दोनों देश खुले संघर्ष में उलझे हुए हैं और हालिया मिसाइल हमलों ने इस टकराव को और गहरा कर दिया है।


🕊️ जब रिश्तों में थी गर्मजोशी

1948 से लेकर 1979 तक ईरान और इज़राइल के संबंध सकारात्मक और सहयोगात्मक रहे। उस समय ईरान में पहलवी वंश के शाह का शासन था, जो अमेरिका का विश्वसनीय सहयोगी माना जाता था। इज़राइल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन ने ईरान से संबंधों को प्राथमिकता दी, भले ही इसके कारण उन्हें अरब दुनिया की नाराजगी झेलनी पड़ी।


🔥 1979 की क्रांति और रिश्तों में दरार

इस रिश्ते में सबसे बड़ा मोड़ 1979 की इस्लामी क्रांति थी, जब अयातुल्लाह ख़ुमैनी के नेतृत्व में ईरान में शाह की सत्ता का अंत हुआ और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई। इस नई सरकार ने इज़राइल को ‘साम्राज्यवादी ताकत’ करार दिया और उससे सभी राजनयिक संबंध समाप्त कर दिए। तेहरान स्थित इज़राइली दूतावास को फ़लस्तीनी संगठन PLO को सौंप दिया गया।


⚔️ धार्मिक वैचारिक टकराव और फिलीस्तीनी मुद्दा

ख़ुमैनी की सरकार ने खुद को वैश्विक ‘मज़लूमों’ का संरक्षक घोषित किया और फिलीस्तीन के समर्थन को अपनी नीति का आधार बनाया। उनके शासन में ईरान ने ऐसे कई गुटों को समर्थन देना शुरू किया जो इज़राइल के खिलाफ सक्रिय थे, जैसे कि हिज़बुल्लाह। ईरान ने खुद को एक इस्लामी शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, जबकि कई अरब राष्ट्र उस वक्त फिलीस्तीनी मुद्दे से पीछे हट रहे थे।


🕶️ छाया युद्ध की शुरुआत

1990 के दशक तक इज़राइल के लिए सबसे बड़ा खतरा इराक का तानाशाह सद्दाम हुसैन था। लेकिन समय के साथ ईरान का बढ़ता क्षेत्रीय प्रभाव और उसके समर्थित गुटों की ताकत ने इज़राइल को सतर्क कर दिया। दोनों देशों के बीच संघर्ष “शैडो वॉर” यानी ‘छाया युद्ध’ का रूप लेता गया—ऐसे हमले जो सीधे घोषित नहीं किए जाते लेकिन गुप्त रूप से एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाते हैं।


☢️ परमाणु कार्यक्रम: सबसे बड़ा तनाव का कारण

इज़राइल के लिए ईरान का परमाणु कार्यक्रम सबसे गंभीर खतरा बना हुआ है। भले ही ईरान इसे नागरिक उद्देश्यों के लिए बताता है, लेकिन इज़राइल और पश्चिमी देश मानते हैं कि इसका उद्देश्य परमाणु हथियार बनाना है।

स्टक्सनेट वायरस, मोहसिन फखरीज़ादेह की हत्या जैसी घटनाएं इस संघर्ष को और गहराती हैं। इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हाल ही में कहा, “अगर ईरान को रोका नहीं गया, तो वह कुछ ही महीनों में परमाणु हथियार बना सकता है—और यह हमारे अस्तित्व के लिए सीधा खतरा होगा।”


🚀 मौजूदा संघर्ष: ऑपरेशन ‘राइज़िंग लायन’ और जवाबी हमले

13 जून को इज़राइल ने ईरान के कई सैन्य और परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला किया। ऑपरेशन ‘राइज़िंग लायन’ के तहत तेहरान, नतांज़ और इस्फ़हान जैसे स्थानों को निशाना बनाया गया। जवाब में ईरान ने भी इज़राइली शहरों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया। दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है और युद्धविराम की कोई संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही।


📌 निष्कर्ष: विश्वासघात नहीं, वैचारिक टकराव बना दुश्मनी की जड़

ईरान और इज़राइल की दुश्मनी किसी एक घटना का नतीजा नहीं, बल्कि यह वर्षों की वैचारिक, सामरिक और रणनीतिक असहमति का परिणाम है। जहां एक ओर ईरान खुद को क्षेत्रीय शक्ति और इस्लामी प्रतिरोध का केंद्र बनाना चाहता है, वहीं इज़राइल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए किसी भी संभावित खतरे को दूर करना चाहता है। यही कारण है कि ये दोनों देश कभी मित्र थे—और अब कट्टर विरोधी बन चुके हैं।

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