मध्य पूर्व एक बार फिर उबाल पर है। ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ता तनाव और अमेरिका की आक्रामक रणनीति ने इस क्षेत्र को नए टकराव के मुहाने पर ला खड़ा किया है। ऐसे समय में अमेरिका की नजरें अब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई पर टिकती नजर आ रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक तीखा बयान दिया:
“हमें अच्छी तरह पता है कि तथाकथित सर्वोच्च नेता कहां छिपे हैं। वह आसान लक्ष्य हैं, लेकिन अभी हम उन्हें मारने नहीं जा रहे — कम से कम फिलहाल नहीं।”
इस बयान ने एक बार फिर 2003 में हुए इराक युद्ध की यादें ताज़ा कर दी हैं, जब अमेरिका ने ‘आतंकवाद के खिलाफ जंग’ के नाम पर सद्दाम हुसैन का तख्तापलट कर दिया था।
जब अमेरिका ने इराक को बदला युद्धभूमि में
2001 के 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध का ऐलान किया। इराक को आतंकवाद का समर्थक और ‘विनाशकारी हथियारों’ का गढ़ बताते हुए राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 2003 में ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ की शुरुआत की। भले ही बाद में यह साबित हुआ कि इराक के पास कोई WMD नहीं थे, लेकिन तब तक सद्दाम हुसैन की सत्ता को उखाड़ फेंका जा चुका था।
सद्दाम हुसैन का अंत: एक तानाशाह का पतन
1979 से सत्ता में रहे सद्दाम हुसैन ने अपने शासनकाल में बर्बरता की सीमाएं लांघ दी थीं। शिया और कुर्द समुदायों पर उनके अत्याचार, ईरान-इराक युद्ध, और कुवैत पर आक्रमण ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर बदनाम कर दिया था।
अमेरिकी हमले के बाद अप्रैल 2003 में बगदाद गिरा और सद्दाम भूमिगत हो गए। दिसंबर में तिकरित के पास एक गुप्त ठिकाने से उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। उनकी दाढ़ी से भरी और थकी हुई तस्वीरें पूरे विश्व में वायरल हो गईं।
उन पर इराक की विशेष अदालत में मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप चले। खास तौर पर 1982 के दजैल नरसंहार के लिए उन्हें दोषी पाया गया, जिसमें 148 शिया नागरिक मारे गए थे। 2006 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई और उसी वर्ष 30 दिसंबर को उन्हें फांसी दे दी गई।
परिवार भी बना निशाना
सद्दाम के बेटे उदय और कुसय जुलाई 2003 में अमेरिकी सैनिकों के साथ मुठभेड़ में मारे गए। उदय पर यौन उत्पीड़न और हत्या के आरोप थे, जबकि कुसय को क्रूर खुफिया प्रमुख माना जाता था। उनके बेटे की भी इस मुठभेड़ में मौत हो गई।
उनकी पत्नी साजिदा तलफाह जॉर्डन में निर्वासन में चली गईं। बेटी रगद को ‘मोस्ट वांटेड’ सूची में रखा गया, और उन्होंने अपने पिता के बचाव की कोशिश की, लेकिन असफल रहीं। राना और हाला नाम की अन्य बेटियाँ भी जॉर्डन में गुमनामी में जीने लगीं।
इराक के पतन के बाद क्या बदला?
सद्दाम के पतन के बाद इराक में राजनीतिक और सामाजिक संकट गहराता गया। अमेरिका ने लोकतंत्र लाने का दावा किया, लेकिन हकीकत में देश सांप्रदायिक हिंसा, सत्ता संघर्ष और आतंकवाद की आग में झुलसता गया।
अल-कायदा के बाद आईएसआईएस का उभार हुआ, और शिया-सुन्नी विभाजन और गहराता गया। अमेरिका की इस कार्रवाई ने न केवल इराक को बल्कि पूरे मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया।
ईरान की बढ़ती भूमिका और खामेनेई की चुनौती
सद्दाम के बाद बने शून्य को ईरान ने अवसर में बदल दिया। शिया प्रभाव को बढ़ाते हुए ईरान ने इराक में अपनी गहरी पकड़ बनाई — खासकर शिया मिलिशिया के माध्यम से। इससे अमेरिका और इज़राइल के लिए एक नई चुनौती खड़ी हो गई।
आज जब खामेनेई अमेरिका के निशाने पर हैं, तो यह सवाल उठता है — क्या इतिहास खुद को दोहराने वाला है? क्या अमेरिका फिर एक क्षेत्रीय शक्ति को उखाड़ने की तैयारी में है? और अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर सिर्फ ईरान या इज़राइल तक सीमित नहीं रहेगा — यह पूरा मध्य पूर्व एक बार फिर आग की लपटों में घिर सकता है।

