वेटिकन सिटी – इतिहास में पहली बार एक अमेरिकी नागरिक को रोमन कैथोलिक चर्च का सर्वोच्च पद, पोप का दर्जा प्राप्त हुआ है। शिकागो में जन्मे रॉबर्ट प्रीवोस्ट, जिन्हें अब पोप लियो 14वें के नाम से जाना जाएगा, हाल ही में वेटिकन के सर्वोच्च धर्मगुरु नियुक्त किए गए हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के साथ ही एक नया कानूनी सवाल भी चर्चा में आ गया है: क्या पोप बनने के बाद भी वे अमेरिकी नागरिक बने रह सकते हैं?
पोप के साथ राष्ट्रपति का दर्जा भी
गौरतलब है कि पोप केवल धार्मिक नेता नहीं होते, वे वेटिकन सिटी – दुनिया के सबसे छोटे संप्रभु राष्ट्र – के हेड ऑफ स्टेट (राज्य प्रमुख) भी होते हैं। यानी अब पोप लियो 14वें एक स्वतंत्र देश के आधिकारिक शासक बन चुके हैं। यही वजह है कि अमेरिकी कानून के तहत उनकी नागरिकता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक हो गया है।
क्या अमेरिकी कानून इसकी इजाजत देता है?
अमेरिकी विदेश विभाग के नियमों के मुताबिक, अगर कोई अमेरिकी नागरिक किसी अन्य देश की सरकार में महत्वपूर्ण पद पर कार्य करता है – जैसे कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री – तो उसकी अमेरिकी नागरिकता की संभावित समीक्षा की जा सकती है। हालांकि यह नागरिकता स्वतः समाप्त नहीं होती।
नागरिकता कानूनों के विशेषज्ञ पीटर स्पिरो के अनुसार, “जब तक कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपनी अमेरिकी नागरिकता त्यागने की घोषणा नहीं करता, तब तक केवल किसी विदेशी पद को ग्रहण करने भर से नागरिकता रद्द नहीं की जा सकती।”
बहु-नागरिकता और पेरू से संबंध
रॉबर्ट प्रीवोस्ट ने अमेरिका के साथ-साथ पेरू की नागरिकता भी प्राप्त की थी, जहाँ उन्होंने मिशनरी और फिर बिशप के रूप में वर्षों तक सेवा दी। पेरू की सरकार की ओर से भी स्पष्ट कर दिया गया है कि उनके पोप बनने से उनकी पेरू की नागरिकता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पेरू के नागरिकता विभाग के अधिकारी जॉर्ज पुच ने कहा, “यह विशुद्ध रूप से धार्मिक और कूटनीतिक मामला है, नागरिकता से इसका कोई विरोध नहीं है।”
निष्कर्ष
पोप लियो 14वें के चयन ने कैथोलिक दुनिया में एक नया इतिहास रच दिया है। साथ ही यह मामला अब अंतरराष्ट्रीय कानून और नागरिकता जैसे गंभीर विषयों को भी छू रहा है। फिलहाल के संकेत यही हैं कि जब तक पोप लियो 14वें स्वयं अमेरिका की नागरिकता त्यागने का निर्णय नहीं लेते, उनकी अमेरिकी पहचान बनी रहेगी।

