
यह मामला साल 1988 का है। खैरागढ़ स्थित पंडित मेडिकल स्टोर्स से 16 मार्च 1988 को ड्रग इंस्पेक्टर ने पैराक्विन टैबलेट का नमूना लिया था। यह दवा इंदौर की कंपनी एम/एस पारस फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट द्वारा बनाई गई बताई गई थी। भोपाल के सरकारी विश्लेषक की जांच रिपोर्ट में दवा को मानक के अनुरूप नहीं पाया गया। इसके बाद विक्रेता, थोक विक्रेता और कंपनी के भागीदारों के खिलाफ ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट, 1940 के तहत मामला दर्ज किया गया।
डोंगरगढ़ की अदालत ने साल 2002 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि दवा का नमूना लेने और जांच की प्रक्रिया सही थी। लेकिन दवा की सप्लाई चेन, यानी निर्माता से लेकर विक्रेता तक की कड़ी को सही तरीके से साबित नहीं किया जा सका। जांच अधिकारी ने मूल बिल और दस्तावेज जब्त नहीं किए, बल्कि केवल उनकी फोटोकॉपी पेश की।
साथ ही, आरोपियों को सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी में दोबारा जांच कराने का कानूनी अधिकार था, लेकिन दवा की समय सीमा खत्म हो जाने के कारण यह जांच संभव नहीं हो पाई। इन कारणों से अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
