
क्या था मामला?
एक सरकारी कर्मचारी, जो पहले चपरासी था और बाद में क्लर्क बना, सितंबर 2000 से अप्रैल 2003 तक बिना अनुमति ड्यूटी पर नहीं आया। उसने अपनी गैरहाजिरी का कारण टीबी की बीमारी बताया और वापसी पर मेडिकल और फिटनेस सर्टिफिकेट जमा किए।
जांच में सामने आया कि ये सर्टिफिकेट CGHS से जारी ही नहीं हुए थे। जिन तारीखों के सर्टिफिकेट दिए गए थे, उन दिनों संबंधित डॉक्टर ड्यूटी पर मौजूद नहीं था। दस्तावेजों पर सही सीरियल नंबर भी नहीं थे।
विभाग ने क्या कार्रवाई की?
लंबे समय तक अनुपस्थित रहने और फर्जी दस्तावेज देने के आरोप में विभाग ने कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की। जांच में आरोप साबित होने के बाद उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।
कर्मचारी ने इस फैसले को सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में चुनौती दी। ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी रद्द कर दी थी और कहा था कि जालसाजी साबित करने के लिए आपराधिक स्तर के सबूत जरूरी हैं।
हाईकोर्ट का फैसला
मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने कहा कि विभागीय जांच में आपराधिक मामलों जैसा “संदेह से परे सबूत” जरूरी नहीं होता।
जांच में यह साफ हुआ कि सर्टिफिकेट नकली थे और कर्मचारी अपनी बीमारी से जुड़ा कोई पक्का मेडिकल रिकॉर्ड भी नहीं दिखा सका। अदालत ने माना कि यह केवल अनुपस्थिति का मामला नहीं था, बल्कि जानबूझकर फर्जी दस्तावेज देने और गलत जानकारी देने का मामला था।
अदालत ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि नकली दस्तावेज देना नियोक्ता के भरोसे को तोड़ता है और यह गंभीर कदाचार है। ऐसे मामले में नौकरी से हटाना गलत नहीं माना जा सकता।
अंत में अदालत ने ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया और कर्मचारी की बर्खास्तगी को सही ठहराया।
क्या सीख मिलती है?
अगर कोई कर्मचारी छुट्टी के लिए फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट देता है, तो उसे सजा या नौकरी से निकाले जाने का खतरा हो सकता है। इसलिए ऐसी गलती करने से पहले सावधान रहना जरूरी है।
