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जंगलों की चीख पुकार: 2024 में जलकर खाक हुआ इटली जितना हरा इलाका

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साल 2024 न सिर्फ तापमान के रिकॉर्ड तोड़ने के लिए जाना जाएगा, बल्कि इस साल इंसान ने प्रकृति को एक और घाव दिया है — जंगलों की तबाही का घावयूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड और ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरी दुनिया में जितना जंगल जला है, उसका कुल क्षेत्रफल इटली के बराबर, यानी करीब 3 लाख वर्ग किलोमीटर से भी ज़्यादा है।

तपिश ही नहीं, जंगलों में आग भी फैला रही है गर्मी

साल 2025 अभी अपने आधे रास्ते पर ही है, और धरती पर गर्मी की मार पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। लू की लपटों और चिलचिलाती धूप के बीच, जंगलों में लगी भीषण आग ने ग्लोबल वॉर्मिंग की भयावहता को फिर उजागर कर दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से अब जंगलों में आग लगने की घटनाएं अधिक सामान्य हो गई हैं — और यह प्रवृत्ति न केवल ठंडी, बल्कि अब उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगी है।

ब्राजील सबसे ज्यादा प्रभावित, कांगो के जंगल भी तबाही की चपेट में

कुछ देशों से आई राहत की खबरें

इस विनाश के बीच मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों ने उम्मीद जगाई है। यहां प्राइमरी फॉरेस्ट लॉस में गिरावट दर्ज की गई है। खास बात यह है कि मलेशिया इस साल उन शीर्ष 10 देशों की सूची से बाहर हो गया है, जहां जंगलों की सबसे ज्यादा कटाई होती रही है।

वादे थे बड़े, लेकिन कदम छोटे निकले

2021 में हुए COP26 सम्मेलन में 140 से अधिक देशों ने वादा किया था कि वे 2030 तक जंगलों की कटाई पर रोक लगाएंगे। मगर ताजा आंकड़ों के अनुसार, यदि इस लक्ष्य को सच करना है, तो हर साल जंगलों के नुकसान में कम से कम 20% की गिरावट ज़रूरी है। हकीकत यह है कि 2024 में 20 में से 17 टॉप जंगल संपन्न देशों ने जंगलों की कटाई में तेजी दिखाई है — गिरावट नहीं।

वैज्ञानिकों की चेतावनी: अगली पीढ़ी के पास समय नहीं होगा

यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के प्रोफेसर मैट हैनसन ने इस स्थिति को “प्रकृति की चेतावनी” बताया है। उनका मानना है कि लगातार बढ़ता तापमान जंगलों को सूखा और ज्वलनशील बना रहा है।
ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच की रिपोर्ट में इसे ग्लोबल रेड अलर्ट करार दिया गया है।
उनका साफ कहना है — अगर जंगल खत्म होते रहे, तो इंसानी ज़िंदगी, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य — सब कुछ अस्थिर हो जाएगा।


🔥 निष्कर्ष: जलती धरती और बुझता भविष्य

जंगल सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि जीवन का संतुलन हैं। अगर आग यूं ही फैलती रही और वादे कागज़ों तक सीमित रहे, तो इंसान खुद अपनी जड़ों को राख बना देगा

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