बांग्लादेश और पाकिस्तान के बाद अब चीन ने अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए नेपाल को अगला केंद्र बनाया है। बीजिंग की नई योजना के तहत नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को एक विशेष मिशन सौंपा गया है — नेपाल की प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों को एकजुट करना। इस घटनाक्रम से भारत-चीन संबंधों पर प्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
भंडारी की बीजिंग यात्रा: सिर्फ कूटनीति नहीं, एक मिशन
नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी, जो केपी शर्मा ओली की पार्टी CPN-UML से जुड़ी रही हैं, हाल ही में चीन की राजधानी बीजिंग के दौरे पर गईं। लेकिन यह दौरा केवल औपचारिक नहीं था।
कांतिपुर मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भंडारी को चीन ने नेपाल में कम्युनिस्ट एकता का सूत्रधार बनाने की जिम्मेदारी दी है। चीन का मानना है कि जब तक नेपाल की बिखरी हुई कम्युनिस्ट ताकतें एकजुट नहीं होंगी, तब तक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक योजनाएं—विशेषकर Belt and Road Initiative (BRI) —पूरी गति से आगे नहीं बढ़ पाएंगी।
नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों के समीकरण
नेपाल में फिलहाल तीन प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियां सक्रिय हैं:
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CPN-UML – नेतृत्व में केपी शर्मा ओली
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माओवादी केंद्र – प्रमुख पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’
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CPN (यूनिफाइड सोशलिस्ट) – नेतृत्व में माधव कुमार नेपाल
तीनों नेता नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और देश की राजनीति में गहरी पकड़ रखते हैं। लेकिन आपसी मतभेदों और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चलते ये पार्टियां अलग-अलग रास्तों पर चल रही हैं।
चीन की रणनीति: कम्युनिस्ट एकता से स्थायी असर
चीन की योजना साफ है — यदि तीनों कम्युनिस्ट पार्टियां एक मंच पर आती हैं, तो न केवल नेपाल की सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत होगी, बल्कि चीन को भी रणनीतिक रूप से लाभ मिलेगा।
इससे न सिर्फ नेपाल में चीनी परियोजनाओं को राजनीतिक सहमति मिल सकती है, बल्कि भारत के प्रभाव को भी सीमित किया जा सकता है, विशेषकर तब जब वर्तमान गठबंधन सरकार में नेपाली कांग्रेस शामिल है, जिसका झुकाव भारत की ओर माना जाता है।
भंडारी की राजनीतिक वापसी?
राजनीति से दो साल दूर रहने के बाद विद्या देवी भंडारी की सक्रियता संकेत देती है कि वे एक बार फिर सत्ता में भूमिका निभाने की इच्छुक हैं। माना जा रहा है कि 2027 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए वह खुद को एक मजबूत नेता के रूप में पेश करना चाहती हैं — एक ऐसा चेहरा जो न सिर्फ आंतरिक राजनीतिक संकट को संभाले बल्कि चीन के भरोसे पर भी खरी उतरे।
भारत के लिए क्या संकेत?
नेपाल भारत का पारंपरिक और सांस्कृतिक साझेदार रहा है। लेकिन अगर चीन की यह योजना सफल होती है, तो यह भारत के लिए भू-राजनीतिक दबाव का कारण बन सकती है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में चीन के बढ़ते प्रभाव के बाद अब नेपाल में इस तरह की सियासी चालें भारत के हितों के लिए चुनौती बन सकती हैं।
निष्कर्ष:
नेपाल में चीन की कूटनीतिक गतिविधियाँ सिर्फ व्यापारिक या आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक मोर्चे पर गहरी पकड़ बनाने की कोशिश है। कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता की यह कवायद सिर्फ नेपाल की राजनीति को नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के समूचे शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

