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पाकिस्तान में महिला न्याय प्रणाली की उलझन: कानून के नाम पर पीड़िता की दौड़भाग

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पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन न्याय पाने की राह आज भी कठिन और भ्रमित करने वाली बनी हुई है। हालात ऐसे हैं कि पीड़िता को यह भी नहीं पता होता कि शिकायत कहां और किससे करनी है। ऐसा एक ऐसे देश में हो रहा है, जहां पिछले चार वर्षों में 6,600 से अधिक उत्पीड़न के मामले दर्ज हो चुके हैं।


तीन संस्थाएं, एक समस्या – लेकिन समाधान नहीं

महिला उत्पीड़न से जुड़े मामलों को पंजाब में तीन प्रमुख सरकारी इकाइयों को सौंपा गया है:

  1. प्रांतीय महिला ओम्बड्सपर्सन कार्यालय

  2. वुमन प्रोटेक्शन अथॉरिटी

  3. वुमन डेवलपमेंट डिपार्टमेंट

हालांकि, इन संस्थाओं के बीच कोई समन्वय नहीं है। अधिकार क्षेत्र की अस्पष्टता, बाहरी लोकेशन, और संवेदनशीलता की कमी के चलते, पीड़ित महिलाओं को एक से दूसरी संस्था के चक्कर काटने पड़ते हैं — बिना यह जाने कि सही दरवाजा कौन सा है।


एक पीड़िता की कहानी: कहा सुना, पर न्याय नहीं

सरकारी कर्मचारी आसिया अशरफ के साथ उनके ही ऑफिस में यौन उत्पीड़न हुआ। उन्होंने सबसे पहले वुमन डेवलपमेंट डिपार्टमेंट की हेल्पलाइन पर कॉल किया। वहां से उन्हें वुमन प्रोटेक्शन अथॉरिटी भेजा गया। कुछ समय बाद वहां से कहा गया कि मामला ओम्बड्सपर्सन के दायरे में आता है — और उन्हें फिर नया चक्कर लगाना पड़ा।

यह कहानी केवल आसिया की नहीं, हजारों महिलाओं की हकीकत बन चुकी है।


एक छत के नीचे क्यों नहीं?

महिला अधिकार अधिवक्ता अमना मलिक के मुताबिक, इन तीनों संस्थानों के कार्यक्षेत्र तय तो हैं, लेकिन इनके बीच कोई साझा प्रक्रिया या संवाद नहीं है। नतीजा यह होता है कि महिलाओं को खुद यह तय करना पड़ता है कि शिकायत किस विभाग में जाए, और यह फैसला अक्सर भ्रम और हताशा में लिया जाता है।

विभागों के कार्यालय भी 15-20 किलोमीटर दूर स्थित हैं, जिससे यात्रा और समय दोनों की लागत महिलाओं को ही चुकानी पड़ती है।


शिकायतें बढ़ीं, लेकिन समाधान की गति सुस्त

एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डेटा के अनुसार,

इन मामलों में अधिकांश पीड़ित महिलाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, सामाजिक कल्याण और अल्पसंख्यक विभागों से जुड़ी हैं।


सरकारी संस्थाओं का पक्ष


निष्कर्ष: जब प्रणाली खुद समस्या बन जाए

पंजाब में महिलाओं को इंसाफ दिलाने की जो व्यवस्था बनाई गई है, वही आज पीड़िता के लिए सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है। तीन-तीन संस्थाओं के बावजूद अगर एक महिला को बार-बार दरवाजा बदलना पड़े, तो सवाल उठता है – क्या कानून केवल दिखावे के लिए है?

जब तक यह तंत्र एक छत के नीचे समन्वित नहीं होता, महिलाओं की लड़ाई सिर्फ उत्पीड़न के खिलाफ नहीं, बल्कि न्याय पाने की उस जटिल प्रक्रिया के खिलाफ भी होगी, जो खुद उनकी राह में दीवार बन गई है।

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