वॉशिंगटन: अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने एक बड़ा और विवादास्पद कदम उठाते हुए सेना से ट्रांसजेंडर सैनिकों को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, रक्षा विभाग ने एक नया आदेश जारी किया है, जिसके तहत करीब 1000 सैनिकों को तुरंत प्रभाव से सेवा से बाहर किया जा सकता है, जबकि बाकी सैनिकों को अपनी पहचान 30 दिनों के भीतर स्वेच्छा से बताने को कहा गया है।
कोर्ट के फैसले के बाद नई गाइडलाइन
इस आदेश की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है, जिसमें ट्रम्प प्रशासन को सेना में ट्रांसजेंडर लोगों की भर्ती और इलाज पर प्रतिबंध लगाने की छूट दी गई है। इसके बाद रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने स्पष्ट कर दिया कि अब ट्रांसजेंडर सैनिकों को डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस (DoD) में स्थान नहीं मिलेगा।
हेगसेथ ने अपने बयान में कहा:
“अब वर्दी में कोई ‘प्रोनाउन्स’ नहीं, अब कोई ‘डूड’ नहीं। हम इन विचारधाराओं से तंग आ चुके हैं।”
मेडिकल रिकॉर्ड से होगी पहचान
रक्षा विभाग अब मेडिकल रिकॉर्ड्स की गहन जांच करेगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन सैनिकों को जेंडर डिस्फोरिया (Gender Dysphoria) का निदान हुआ है। जिन सैनिकों का इस संबंध में इलाज चल रहा है या पहले से लक्षण मौजूद हैं, उन्हें सेवा से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
जेंडर डिस्फोरिया एक मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति की जैविक लिंग पहचान उसकी मानसिक लिंग पहचान से मेल नहीं खाती।
इलाज पर खर्च हुए 52 मिलियन डॉलर
रक्षा अधिकारियों के अनुसार, 2015 से 2024 के बीच ट्रांसजेंडर सैनिकों के इलाज—जिसमें हार्मोन थेरेपी, सर्जरी और मनोचिकित्सा शामिल है—पर अमेरिकी सेना ने लगभग 52 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं।
9 दिसंबर 2024 तक करीब 4,240 सैनिकों को जेंडर डिस्फोरिया का निदान किया गया था, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि यह संख्या और अधिक हो सकती है।
क्या कहती है नई समयसीमा
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एक्टिव ड्यूटी सैनिकों को 6 जून 2025 तक अपनी लिंग पहचान स्पष्ट करने को कहा गया है।
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नेशनल गार्ड और रिजर्व सैनिकों के लिए समयसीमा 7 जुलाई 2025 तय की गई है।
फरवरी में भी ऐसा एक मेमो जारी किया गया था, लेकिन कानूनी विवादों के चलते कार्रवाई स्थगित हो गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह नीति दोबारा लागू की जा रही है।
सेना में ट्रांसजेंडर प्रतिबंध: विवाद और बहस
इस कदम ने अमेरिका में मानवाधिकार संगठनों और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय में चिंता बढ़ा दी है। आलोचकों का कहना है कि यह नीति भेदभावपूर्ण है और ट्रांसजेंडर लोगों की देशसेवा की भावना पर हमला है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि यह कदम सेना की “ताकत और एकरूपता” को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
निष्कर्ष:
21 लाख सैनिकों वाली अमेरिकी सेना में यह फैसला न केवल ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए गंभीर संदेश है, बल्कि यह भविष्य की सैन्य नीति और समावेशन के मुद्दे को लेकर वैश्विक चर्चा का विषय बन सकता है।

