
कैसे चल रहा है यह खेल?
📌 स्कूलों ने अपनी पसंदीदा बुक स्टोर्स तय कर ली हैं।
📌 पालकों को उन्हीं दुकानों से किताबें खरीदने का निर्देश दिया जाता है।
📌 बुक सेट में सिर्फ 3-4 किताबें ही एनसीईआरटी की होती हैं, बाकी प्राइवेट पब्लिकेशन की।
📌 स्कूल संचालकों और दुकानदारों के बीच मोटा कमीशन फिक्स किया गया है।
📌 हर साल स्कूल की यूनिफॉर्म भी बदली जाती है ताकि पालकों से अधिक पैसे वसूले जा सकें।
शासन के आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित
सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि सभी स्कूलों में सिर्फ एनसीईआरटी या राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा मान्य किताबें ही पढ़ाई जाएं। इसके बावजूद, प्राइवेट स्कूल संचालक अपने फायदे के लिए निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें बिकवा रहे हैं, जिससे बच्चों के बस्ते का बोझ और पालकों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
कार्रवाई सिर्फ दुकानदारों पर, स्कूल संचालक बच जाते हैं
जब प्रशासन कार्रवाई करता है तो केवल किताब बेचने वाले दुकानदारों पर गाज गिरती है, लेकिन स्कूल संचालक आसानी से बच निकलते हैं। पिछली बार कुछ दुकानों को सील किया गया था, लेकिन स्कूलों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
विद्यार्थी परिषद ने की शिकायत
छात्र संगठनों ने निजी प्रकाशकों की महंगी किताबों को प्रतिबंधित करने की मांग की है। उन्होंने प्रशासन से कहा है कि प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाई जाए ताकि पालकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
प्रशासन की क्या योजना है?
📌 पालकों की शिकायतों की जांच के लिए जिला और विकासखंड स्तर पर कमेटी बनाई जाएगी।
📌 यदि अनियमितता पाई गई, तो दोषी स्कूलों पर कार्रवाई की जाएगी।
📌 पालकों को राहत देने के लिए छापामार कार्रवाई भी की जा सकती है।
पालकों की प्रतिक्रिया
🗣 मुंशीलाल (पालक) – “मेरे बच्चे की कक्षा दो की किताबों के लिए 2500 रुपये मांगे गए।”
🗣 सुषमा सिंह (पालक) – “कक्षा पांच की किताबों के लिए 3500 रुपये वसूले गए।”
अब देखना यह होगा कि प्रशासन वास्तविक कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाता है।
