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बसपा से कम उम्र की कई पार्टियां आज सत्ता में, मायावती की पार्टी का असर हुआ कमजोर

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल कांशीराम की जयंती (15 मार्च) को लेकर सक्रिय हो गए हैं। सभी पार्टियां दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आजाद समाज पार्टी और बसपा समेत कई दल कांशीराम की विरासत का जिक्र कर रहे हैं।

राहुल गांधी ने की भारत रत्न देने की मांग

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लखनऊ में कार्यक्रम कर कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग उठाई। इस बयान के बाद बसपा सहित कई दलों के नेताओं ने प्रतिक्रिया दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित वोट बैंक को लेकर सभी पार्टियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है।

बसपा का राजनीतिक सफर

कांशीराम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की थी। पार्टी का उद्देश्य दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग को राजनीतिक ताकत देना था। 2007 में बसपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, जो पार्टी का सबसे मजबूत दौर माना जाता है।

लेकिन इसके बाद पार्टी का प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया।

  • 2012 विधानसभा चुनाव: 80 सीटें

  • 2017 विधानसभा चुनाव: 19 सीटें

  • 2022 विधानसभा चुनाव: केवल 1 सीट

हालांकि 2022 चुनाव में पार्टी को करीब 12–13 प्रतिशत वोट अभी भी मिले थे।

बसपा से कम उम्र की पार्टियां ज्यादा मजबूत

बसपा के बाद बनी कई पार्टियां आज उससे बेहतर स्थिति में हैं। इनमें भाजपा, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, तेलुगु देशम पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और बीजू जनता दल जैसी पार्टियां शामिल हैं। इनमें से कई दल अपने राज्यों में सरकार चला रहे हैं या मजबूत विपक्ष हैं।

कांशीराम की विरासत पर राजनीति

कांशीराम का नारा था – “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।” यही वजह है कि कई राजनीतिक दल दलित और पिछड़े वर्ग के वोटरों को आकर्षित करने के लिए उनकी विचारधारा का जिक्र कर रहे हैं।

समाजवादी पार्टी ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का फार्मूला अपनाया है, जबकि कांग्रेस जातीय जनगणना और आबादी के आधार पर हिस्सेदारी की बात कर रही है।

यूपी की राजनीति में दलित वोट अहम

उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। 2022 चुनाव में इनमें से अधिकांश सीटें बीजेपी के पास गई थीं।

अब 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह देखना दिलचस्प होगा कि दलित वोट किस पार्टी की ओर जाते हैं और राज्य की राजनीति को किस दिशा में ले जाते हैं।

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