ढाका:
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने एक ऐतिहासिक और विवादास्पद कदम उठाते हुए बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान से ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि औपचारिक रूप से वापस ले ली है। हालिया कानूनी संशोधन के तहत, राष्ट्रीय कानूनों और संविधान से जुड़े कई दस्तावेजों से मुजीबुर रहमान का उल्लेख हटा दिया गया है।
⚖️ कानून में बदलाव, नई परिभाषा लागू
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स (जैसे ढाका ट्रिब्यून, bdnews24.com और डेली स्टार) के अनुसार, सरकार ने ‘राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी परिषद अधिनियम’ में संशोधन करते हुए मुक्ति संग्राम से जुड़े विवरणों में व्यापक बदलाव किए हैं।
नए अध्यादेश के तहत:
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“राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान” शब्दों को सभी सरकारी परिभाषाओं से हटाया गया है।
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स्वतंत्रता संग्राम की पुरानी परिभाषा, जिसमें मुजीब की भूमिका को केंद्रीय बताया गया था, अब उनके नाम के बिना नए रूप में दर्ज की गई है।
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1971 में गठित मुजीबनगर सरकार से जुड़े सांसदों को अब स्वतंत्रता सेनानी की बजाय “मुक्ति संग्राम के सहयोगी” की श्रेणी में रखा गया है।
🪙 मुजीब की तस्वीरें पहले ही हटाई जा चुकी थीं
इससे पहले अंतरिम सरकार ने एक और प्रतीकात्मक फैसला लेते हुए नई करेंसी नोटों से मुजीबुर रहमान की तस्वीरें हटा दी थीं, जिससे राजनीतिक हलकों में पहले से ही हलचल थी। अब इस उपाधि की वापसी ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है।
🛡️ किन्हें मिलेगी स्वतंत्रता सेनानी की मान्यता?
संशोधित नियमों के अनुसार, वे सभी नागरिक जिन्होंने:
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26 मार्च से 16 दिसंबर 1971 के बीच देश में या भारत में युद्ध के लिए प्रशिक्षण लिया,
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पाकिस्तानी सेना या उसके सहयोगियों के खिलाफ हथियार उठाया,
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और उस समय सरकार द्वारा तय न्यूनतम उम्र सीमा को पूरा किया,
वे “स्वतंत्रता सेनानी” माने जाएंगे। इस सूची से रजाकार, अल-बद्र, अल-शम्स और कुछ इस्लामी संगठनों के सदस्य स्पष्ट रूप से बाहर रखे गए हैं।
👤 मुजीबुर रहमान कौन थे, और उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ क्यों कहा जाता है?
शेख मुजीबुर रहमान (17 मार्च 1920 – 15 अगस्त 1975) बांग्लादेश के पहले प्रधानमंत्री और बाद में राष्ट्रपति बने।
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वे आवामी लीग के संस्थापक थे और पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियों के अधिकारों की लड़ाई के मुखर नेता।
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1970 में हुए आम चुनावों में भारी जीत के बाद भी जब सत्ता उन्हें नहीं सौंपी गई, तो उन्होंने स्वतंत्रता का आह्वान किया।
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उनके नेतृत्व में 1971 का मुक्ति संग्राम हुआ, जिसमें भारत के समर्थन से बांग्लादेश ने पाकिस्तान से आज़ादी पाई।
उनके इतिहास-निर्माता भाषण, विशेष रूप से 7 मार्च 1971 का भाषण, और बलिदान ने उन्हें बांग्लादेश में ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि दिलाई थी।
🧭 राजनीतिक संदर्भ और असर
शेख हसीना की सरकार के तख्तापलट के बाद बनी इस अंतरिम सरकार के फैसलों को राजनीतिक पुनर्लेखन (rewriting of history) की तरह देखा जा रहा है। आलोचकों का मानना है कि यह कदम देश की राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज कर सकता है।
📌 निष्कर्ष
बांग्लादेश की राजनीति में यह फैसला एक ऐतिहासिक मोड़ की तरह देखा जा रहा है। शेख मुजीबुर रहमान की भूमिका पर उठते सवाल केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले वर्षों में बांग्लादेश की राष्ट्रीय पहचान और विचारधारा को भी प्रभावित कर सकते हैं।

