
नई लिस्ट का हाल
- 53 जिलाध्यक्षों में से 43 नए चेहरे हैं, जबकि 10 पुराने जिलाध्यक्षों को फिर से मौका मिला।
- ब्राह्मण और यादवों का दबदबा है—10-10 जिलाध्यक्ष इन्हीं जातियों से बनाए गए।
- इसके अलावा, 7 भूमिहार, 5 राजपूत, 2 कायस्थ, 7 मुसलमान और 1 सिख को जिम्मेदारी दी गई।
- पिछड़ा वर्ग में 10 यादव, 7 दलित और 3 कुशवाहा को जिलाध्यक्ष बनाया गया।
कांग्रेस की रणनीति
- पार्टी पुराने वोट बैंक को जोड़ने के साथ यादव और ब्राह्मण समुदायों पर दांव खेल रही है।
- यह कदम आरजेडी के वोट बैंक में सेंधमारी के रूप में भी देखा जा रहा है।
- कुल 38 जिलों में सवर्ण, दलित और मुस्लिम नेताओं को कमान सौंपी गई।
विवाद और आलोचना
- कुछ नेताओं का कहना है कि कई जिलों में सवर्ण नेताओं की पकड़ मजबूत है और उन्हें अनुभव और संगठन क्षमता के आधार पर जिम्मेदारी देना सही है।
- विरोधियों का तर्क है कि यह सामाजिक संतुलन के खिलाफ है और इससे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में नाराजगी बढ़ सकती है।
निष्कर्ष
बिहार कांग्रेस ने हार के बाद संगठन को मजबूत और नए सिरे से सक्रिय करने के लिए यह बदलाव किया है, लेकिन सामाजिक और जातीय संतुलन को लेकर पार्टी के अंदर और बाहर सवाल उठ रहे हैं।
