अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय शांति के स्वयंभू सूत्रधार बनने की कोशिशों में हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर के बाद से ट्रंप इसे अपनी जीत बताने में जुटे हैं — लेकिन इस बार उनके सबसे करीबी साथी माने जाने वाले इज़राइल ने ही उनकी ‘मध्यस्थता’ को नकार दिया है।
कश्मीर पर दखल की पेशकश, मिला भारत से जवाब
ट्रंप ने हाल ही में न केवल भारत और पाकिस्तान के बीच हुई संघर्षविराम को अपनी कूटनीतिक सफलता बताया, बल्कि कश्मीर जैसे संवेदनशील मसले पर भी खुद को समाधानकर्ता के रूप में पेश किया। भारत सरकार ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए ट्रंप की भूमिका को सिरे से खारिज कर दिया।
इज़राइल ने भी नहीं दी तवज्जो
ट्रंप की ‘शांति की पहल’ को असली झटका तब लगा जब इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गाज़ा में युद्ध विराम की किसी भी संभावना को सिरे से नकार दिया। नेतन्याहू ने साफ कर दिया कि जब तक हमास का पूरी तरह से खात्मा नहीं हो जाता, इज़राइल अपना सैन्य अभियान नहीं रोकेगा — चाहे अमेरिका कितनी भी मध्यस्थता कर ले।
गाज़ा में हवाई हमले, सीजफायर की उम्मीद कमजोर
ट्रंप के मध्य पूर्व दौरे के बीच इज़राइल ने गाज़ा के दो अस्पतालों पर हवाई हमले किए, जिनमें कई लोगों की मौत हो गई। इन घटनाओं ने युद्ध विराम को लेकर अमेरिका की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है। ट्रंप जहां इस क्षेत्र में अपनी ‘शांति नीति’ को साबित करना चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू उनके प्रयासों को कोई खास तवज्जो नहीं दे रहे।
हमास से संवाद ने बढ़ाई दरार
ट्रंप प्रशासन ने गुप्त चैनलों से हमास से संवाद की शुरुआत की, जिसके बाद एक अमेरिकी बंधक की रिहाई भी हुई। पर इस घटनाक्रम ने अमेरिका और इज़राइल के रिश्तों में संभावित खटास की नींव रख दी है। नेतन्याहू की सख्ती और ट्रंप की ‘शांति छवि’ के बीच अब टकराव बढ़ने की आशंका है।
ट्रंप का सपना, हकीकत से दूर
डोनाल्ड ट्रंप अपनी छवि को वैश्विक शांति निर्माता के तौर पर स्थापित करने की होड़ में हैं — यूक्रेन, सीरिया, भारत-पाकिस्तान, और अब गाज़ा। लेकिन इज़राइल की प्रतिक्रिया साफ इशारा करती है कि जमीन पर हालात उतने सरल नहीं जितने वे अपने भाषणों में दिखाते हैं।

