साधुओं का दावा—ध्यान में थम जाती हैं सांसें, मृत्यु के 15 दिन बाद होता है अंतिम संस्कार
हिमालय की जमा देने वाली ठंड… तापमान माइनस 10 डिग्री सेल्सियस… चारों तरफ बर्फ और सन्नाटा। ऐसी जगह जहां आम इंसान कुछ मिनट भी बिना गर्म कपड़ों के नहीं टिक सकता, वहां कुछ साधु नंगे बदन तपस्या करते नजर आते हैं। इनकी साधना लोगों के लिए आज भी रहस्य, आस्था और हैरानी का विषय बनी हुई है।
इन साधुओं का दावा है कि वर्षों की तपस्या और योग अभ्यास के बाद वे अपने शरीर और सांसों पर ऐसा नियंत्रण पा लेते हैं कि कड़कड़ाती ठंड भी उनकी साधना को रोक नहीं पाती। उनका कहना है कि गहरे ध्यान में शरीर शांत हो जाता है और सांसें इतनी धीमी हो जाती हैं कि बाहर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे सांसें थम गई हों।
साधु-संतों के अनुसार, यह कोई सामान्य अभ्यास नहीं है। इसके पीछे वर्षों का अनुशासन, गुरु की शिक्षा, ब्रह्मचर्य, सीमित भोजन और लगातार ध्यान की साधना होती है। वे बताते हैं कि शरीर को ठंड, भूख और थकान सहने के लिए धीरे-धीरे तैयार किया जाता है।
सबसे चौंकाने वाली बात उनकी अंतिम परंपरा को लेकर सामने आती है। कुछ संप्रदायों में मान्यता है कि ऐसे तपस्वी संतों के शरीर का अंतिम संस्कार तुरंत नहीं किया जाता। कई बार मृत्यु के बाद शरीर को 15 दिन तक धार्मिक विधि और समाधि परंपरा के अनुसार रखा जाता है। इसके बाद अंतिम संस्कार या समाधि की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इन साधुओं की तपस्या देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। कोई इसे चमत्कार मानता है, तो कोई योग और ध्यान की ताकत। वहीं आध्यात्मिक जानकारों का कहना है कि ऐसी साधना आम लोगों के लिए नहीं है। बिना गुरु और अभ्यास के इस तरह की कोशिश जानलेवा हो सकती है।
बड़ी बात
माइनस तापमान में नंगे बदन तपस्या करने वाले ये साधु भारतीय योग, ध्यान और तप की उस परंपरा को सामने लाते हैं, जो सदियों से लोगों के लिए रहस्य बनी हुई है। विज्ञान के लिए यह शोध का विषय हो सकता है, लेकिन आस्था रखने वालों के लिए यह साधना और विश्वास की शक्ति है।

