
इस बदलाव से फसल की योजना, सिंचाई नीति, एमएसपी पर खरीद, बीमा योजना, और अनुदान नीति जैसे कई फैसले अब नई जलवायु के अनुसार तय किए जा सकेंगे। यह रिपोर्ट राज्य के मुख्य सचिव को भेज दी गई है और इसे नीतिगत रूप से लागू करने की सिफारिश की गई है।
🔍 रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:
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बीकानेर अब जैसलमेर से ज्यादा रेगिस्तानी माना गया है।
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जयपुर को अब सीकर और झुंझुनूं जैसे आंतरिक प्रवाह जोन में रखा गया है।
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टोंक और दौसा को अर्ध-शुष्क जोन से हटाकर बाढ़ प्रभावित जोन में शामिल किया गया है।
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सिरोही जिले को दो अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया है, जिससे अब वहां मक्का जैसी फसलों की सिफारिश संभव है।
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उदयपुर और चित्तौड़गढ़ को अब चावल उगाने वाले क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है।
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बाड़मेर और जालोर को नर्मदा नदी के प्रभाव की वजह से एक जैसे मौसम वाले क्षेत्र में रखा गया है।
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हाड़ौती क्षेत्र में अब प्रतापगढ़ को भी शामिल किया गया है, जहां अब सरसों, सोयाबीन और ज्वार की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।
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जैसलमेर, जो पहले सबसे ज्यादा सूखा क्षेत्र माना जाता था, अब जोधपुर और नागौर के साथ एक नए जलवायु क्लस्टर में शामिल किया गया है।
📌 क्यों है यह रिपोर्ट जरूरी?
राजस्थान का बड़ा हिस्सा सूखा और अर्ध-शुष्क है, जहां खेती वर्षा पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण पारंपरिक फसलों की उत्पादकता घट रही है, जिससे किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ रहा है।
यह रिपोर्ट राज्य सरकार को वैज्ञानिक आधार पर नई नीति बनाने में मदद करेगी, जिससे खेती को मौसम के अनुसार ढालना आसान होगा।
🧠 विशेषज्ञों की राय:
🗣️ डॉ. ओपी यादव (पूर्व निदेशक, काजरी):
“यह अध्ययन राज्य सरकार के लिए नीति निर्धारण का वैज्ञानिक आधार बन सकता है।”
🗣️ डॉ. पी. सांतरा (प्रधान वैज्ञानिक, काजरी):
“इस रिपोर्ट से खेती, सिंचाई, बीज वितरण, फसल बीमा और सरकारी योजनाओं में बदलाव लाया जा सकेगा।”
✅ नतीजा:
अब राज्य सरकार इस नई रिपोर्ट के आधार पर कृषि नीतियों को बेहतर ढंग से लागू कर पाएगी और किसानों को मौसम के अनुसार सही फसल और संसाधन उपलब्ध करवाने में मदद मिलेगी।
