
नियम बने, लेकिन इन जिलों को नहीं मिला फायदा
राज्य सरकार ने 2022 में संविदाकर्मियों के स्थायीकरण (रेग्युलराइजेशन) के लिए नियम बनाए थे। इन नियमों का फायदा प्रदेश के ज्यादातर जिलों के कर्मचारियों को मिल गया, लेकिन बांसवाड़ा, डूंगरपुर और सिरोही के कर्मियों को इससे बाहर कर दिया गया।
इसकी मुख्य वजह यह रही कि इन कर्मचारियों की नियुक्ति के समय लोक विज्ञापन (Public Advertisement) जारी नहीं किया गया था। यही तकनीकी गलती आज इनके लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई।
कैसे हुई थी भर्ती, और कहां हुई चूक?
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साल 2008 में जिला परिषद ने प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए करीब 200 लोगों की भर्ती की।
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इसके बाद 2010 में जिला कलेक्टर और वित्त विभाग के आदेश से इन्हें सीधे संविदा पर रखा गया।
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उस समय विभाग ने अनुभव और संतोषजनक सेवा को आधार बनाया, लेकिन लोक विज्ञापन जारी नहीं किया।
यही चूक बाद में बने नियमों में इनके खिलाफ चली गई।
कितने कर्मचारी प्रभावित?
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152 संविदाकर्मी बांसवाड़ा जिले में
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100 संविदाकर्मी डूंगरपुर जिले में
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80 संविदाकर्मी सिरोही जिले में
ये सभी कर्मचारी आज भी अल्प मानदेय पर काम कर रहे हैं।
आंदोलन और ज्ञापन, फिर भी समाधान नहीं
स्थायीकरण नहीं होने से नाराज नरेगा कार्मिक संघ पिछले ढाई साल से आंदोलन कर रहा है।
संघ ने जिला कलेक्टर, मुख्य सचिव, ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा और मुख्यमंत्री तक को कई बार ज्ञापन सौंपे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस फैसला नहीं हुआ है।
संघ के उपाध्यक्ष मितेंद्र सिंह राठौड़ का कहना है कि महंगाई के इस दौर में भी कर्मचारियों को कम वेतन में काम करना पड़ रहा है, जो बेहद अन्यायपूर्ण है।
प्रशासन का क्या कहना है?
जिला परिषद बांसवाड़ा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गोपाल लाल स्वर्णकार का कहना है कि 2022 में बने नियमों की वजह से यह परेशानी आ रही है और इस मामले को लेकर राज्य सरकार को पत्र भी लिखा गया है।
निष्कर्ष
तीन जिलों के संविदाकर्मी 18 साल की सेवा के बाद भी स्थायी नौकरी से वंचित हैं, जबकि बाकी जिलों में यही कर्मचारी पहले ही नियमित हो चुके हैं। अब सभी की नजर सरकार पर है कि वह नियमों में राहत देकर इन कर्मचारियों को भी न्याय और स्थायित्व कब देती है।
