
जुरासिक युग में हुआ था टकराव
वैज्ञानिकों का कहना है कि ऊपरी मध्य जुरासिक युग में एक लौह-समृद्ध उल्कापिंड पृथ्वी से टकराया था। इस टकराव से करीब 3.5 किलोमीटर व्यास का गोलाकार क्रेटर बना, जिसे आज रामगढ़ क्रेटर के नाम से जाना जाता है।
यह शोध लूनर एंड प्लेनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस (LPSC) 2026 में अमेरिका के टेक्सास में प्रस्तुत किया जाएगा। क्रेटर पर वर्ष 2020 से लगातार अध्ययन किया जा रहा है।
दिल्ली-हरियाणा से आई थी शोध टीम
करीब 40 दिन पहले दिल्ली और हरियाणा से वैज्ञानिकों की एक टीम रामगढ़ क्रेटर पहुंची थी। टीम ने
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ड्रोन से सर्वे किया
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पत्थरों और चट्टानों के नमूने जुटाए
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इन्हें आगे की जांच के लिए अपने साथ ले गई
सूक्ष्म चुंबकीय कणों से मिला बड़ा संकेत
नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने क्रेटर के भीतर खोदी गई दो उथली खाइयों से करीब 30 तलछटी नमूने लिए। चुंबकों की मदद से मिट्टी से सूक्ष्म चुंबकीय कण अलग किए गए और उनका माइक्रोस्कोप व रासायनिक परीक्षण किया गया।
माइक्रोटेक्टाइट्स जैसी संरचना
कई कण एक मिलीमीटर से भी छोटे, चिकने और गोलाकार पाए गए। इससे संकेत मिलता है कि टकराव के समय चट्टानें
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बहुत अधिक तापमान पर पिघलीं
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हवा में उछलीं
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और तेजी से ठंडी होकर ठोस बन गईं
इनकी बनावट माइक्रोटेक्टाइट्स जैसी है, जो आमतौर पर उल्कापिंड टकराव के दौरान बनते हैं।
आयरन, निकेल और सिलिकॉन की पुष्टि
रासायनिक जांच में इन कणों में
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आयरन (लोहा)
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निकेल
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सिलिकॉन
की मौजूदगी मिली।
खास बात यह है कि निकेल उल्कापिंडों में आम होता है, लेकिन रामगढ़ क्षेत्र की स्थानीय चट्टानों में बहुत कम मिलता है। कुछ कणों में अत्यधिक आयरन और आयरन-समृद्ध खनिज संरचनाएं भी पाई गईं।
आगे और खुलासे की उम्मीद
वैज्ञानिकों का मानना है कि आगे होने वाले शोध से
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उल्कापिंड के टकराव का सही समय
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और उसकी प्रकृति
को लेकर और पुख्ता सबूत मिल सकते हैं।
निष्कर्ष
रामगढ़ क्रेटर अब सिर्फ एक रहस्यमयी गड्ढा नहीं, बल्कि भारत के प्राचीन उल्कापिंड टकरावों का महत्वपूर्ण प्रमाण बनता जा रहा है। यह खोज राजस्थान को वैश्विक भूवैज्ञानिक मानचित्र पर और भी खास बनाती है।
