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राजस्थान में 12 साल में जांच मशीनों के रखरखाव पर 600 करोड़ खर्च, 8 साल तक एक ही कंपनी को मिला ठेका

विकास जैन, जयपुर।

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में जांच मशीनों की मरम्मत और देखरेख के लिए पिछले 12 साल में करीब 600 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। यह पैसा ‘ई-उपकरण योजना’ के तहत खर्च हुआ है। चौंकाने वाली बात यह है कि इतने बड़े बजट का काम 8 साल तक एक ही कंपनी को दिया गया। इस कंपनी को ठेका हर बार सालाना नहीं, बल्कि तीन-तीन साल के लिए दिया गया।

कैसे चला टेंडर और ठेका देने का खेल?

  • 2016 में पहली बार ठेका दिया गया।

  • 2020-21 में दूसरी बार टेंडर प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन कोविड के बहाने इसे रोक दिया गया।

  • 2021-22 में फिर से वही कंपनी को करीब 167 करोड़ रुपये में तीन साल के लिए काम दे दिया गया।

  • अब तीसरी बार टेंडर हुआ, जिसमें किर्लोस्कर और साइरिक्स नाम की दो कंपनियां शामिल हुईं।

  • इस बार योजना का बजट 100% बढ़ाकर 300 करोड़ रुपये से ज्यादा कर दिया गया है।

  • अब राजस्थान को दो हिस्सों (जोन ए और बी) में बांटकर दोनों कंपनियों को अलग-अलग जिले दिए जा रहे हैं।

शुरुआत में मेडिकल कॉलेज शामिल नहीं थे

पहले पांच साल तक इस योजना में मेडिकल कॉलेजों को शामिल ही नहीं किया गया। जबकि जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा और बीकानेर जैसे बड़े मेडिकल कॉलेजों में सबसे ज्यादा मरीज आते हैं और जांच मशीनों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

ऑफलाइन भी दी जाती रही खराब मशीनों की सूचना

ई-उपकरण योजना में तय किया गया था कि अगर समय पर मशीनें ठीक नहीं होतीं तो सॉफ्टवेयर के जरिए अपने आप जुर्माना लगेगा। लेकिन सूत्रों के मुताबिक कई बार मशीन खराब होने की जानकारी ऑफलाइन दी जाती रही, जिससे पेनल्टी से बचा जा सके।

आरएमएससीएल का दावा – मशीनें जल्दी ठीक हो रही हैं

राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन (RMSCL) का कहना है कि:

  • नई निविदा का मूल्य 201.95 करोड़ रुपये + GST है।

  • मशीनें ठीक करने का समय 95% तक घटा दिया गया है।

  • पहले उपकरणों की कुल कीमत 1000 करोड़ थी, अब यह बढ़कर 1600 करोड़ हो गई है।

  • रखरखाव दर 3.5% से बढ़कर 6% तक हो गई है।

बड़े अस्पतालों में भी नहीं रखे बायो इंजीनियर

इतना पैसा खर्च करने के बावजूद कई बड़े अस्पतालों में बायो इंजीनियर नहीं रखे गए। जबकि शुरुआत में ही यह प्रावधान होना चाहिए था ताकि मशीनें समय पर ठीक हो सकें।


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