जून का महीना खुलासों, आरोपों और राजनीतिक उतार-चढ़ाव से भरा रहा। इसी दौरान भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर की जा रही ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की स्ट्राइक्स को कुछ शर्तों के साथ रोकने का ऐलान किया।
10 मई तक चली इन कार्रवाईयों के बाद पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री इशाक डार ने स्वीकार किया कि इस्लामाबाद ने भारत से सीज़फायर की अपील की थी, विशेषकर नूर खान एयरबेस और अन्य सैन्य ठिकानों पर हमलों के बाद।
🔍 नूर खान एयरबेस पर अमेरिका का नियंत्रण?
पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार इम्तियाज़ गुल ने हाल ही में दावा किया कि रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण है। उन्होंने एक पॉडकास्ट में कहा कि यहां पाकिस्तानी सैनिकों को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं होती। एक वायुसेना अधिकारी जब अमेरिकी मालवाहक विमान का सामान देखने गया तो उसे बंदूक की नोक पर रोका गया।
यह खुलासा पाकिस्तान की सत्ता के गलियारों — इस्लामाबाद और रावलपिंडी — दोनों को शर्मिंदा कर गया।
📺 सेना के पूर्व जनरल का चौंकाने वाला बयान
एक पुराने वायरल वीडियो में लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) शाहिद अज़ीज़ कहते हैं कि 9/11 के बाद जैकबाबाद और पासनी के एयरबेस पूरी तरह अमेरिकी नियंत्रण में थे।
उन्होंने बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने खुद सेना के शीर्ष अधिकारियों को कहा था कि अमेरिका को यह सब पहले ही सौंप दिया गया है — यानी सैनिकों की मर्जी के खिलाफ।
🇺🇸 पाकिस्तान: अमेरिका का “लचीला सहयोगी”
पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका की रणनीतिक ज़रूरतों को पूरा करता आया है — कभी आर्थिक सहयोग के बदले, तो कभी दबाव में। भू-राजनीतिक दृष्टि से इसकी स्थिति बेहद अहम है: ईरान, अफगानिस्तान और चीन की सीमा से सटा होने के कारण पाकिस्तान एक आदर्श ‘लॉन्चपैड’ और ‘सुनने की चौकी’ बन जाता है।
यह बात कोई नई नहीं है कि अमेरिका कराची पोर्ट और चकला (रावलपिंडी) एयरबेस का लंबे समय से उपयोग करता रहा है — खासकर शीत युद्ध और अफगानिस्तान पर सोवियत कब्जे के समय।
📘 ‘द बेयर ट्रैप’ का चौंकाने वाला दस्तावेज़
ब्रिगेडियर मोहम्मद यूसुफ और मेजर मार्क एडकिन की किताब “The Bear Trap” में यह विस्तार से बताया गया है कि 1980 के दशक में CIA और ISI कैसे मिलकर गुप्त हथियारों की आपूर्ति करते थे।
“रात के अंधेरे में अमेरिकी विमान चुपचाप चकला एयरबेस पर उतरते थे, कोई कस्टम या इमिग्रेशन नहीं, सब कुछ पूरी तरह से CIA के नियंत्रण में।”
एक उदाहरण में बताया गया कि अमेरिकी राजदूत अमेरिकी विमानों के आगमन के वक्त जानबूझकर ‘डिप्लोमैटिक डिनर’ की मेज़बानी करते थे ताकि ध्यान भटकाया जा सके।
🕵️♂️ “हमने तीन दशकों तक अमेरिका का गंदा काम किया है”
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का एक वीडियो भी हाल में वायरल हुआ, जिसमें वो कहते हैं:
“हमने तीन दशकों तक अमेरिका के लिए गंदा काम किया है।”
यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि इतिहास का एक ज़िंदा दस्तावेज़ है — जो पाकिस्तान की रणनीतिक आज़ादी और अमेरिका पर निर्भरता पर सवाल खड़ा करता है।
🍽️ व्हाइट हाउस में लंच — और कूटनीतिक संकेत
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में लंच पर बुलाया।
यह पहली बार था जब किसी पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख को — जो सत्ता में नहीं हैं — अमेरिकी राष्ट्रपति से इस तरह की सीधी कूटनीतिक दावत मिली।
यह मुलाकात ऐसे समय पर हुई जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बंकर बस्टर बम गिराए। ऐसे में यह सोचना गलत नहीं कि उस लंच टेबल पर बलोचिस्तान की खनिज संपदा से लेकर ईरान और अफगानिस्तान की रणनीति तक, कई गंभीर विषयों पर चर्चा हुई होगी।
🎯 निष्कर्ष: “द ग्रेट गेम” अब भी जारी है
सोवियत संघ अब नहीं रहा, लेकिन “द ग्रेट गेम” आज भी पाकिस्तान के ज़रिए जारी है।
चाहे अमेरिका को अफगानिस्तान पर नजर रखनी हो, या ईरान पर दबाव बनाना हो — पाकिस्तान एक बार फिर रणनीतिक शतरंज का केंद्रबिंदु बन गया है।

