सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि बच्चों को ऐश के लिए पैसा और गाड़ी की चाबियां देने के लिए माता-पिता जिम्मेदार हैं। यह बात सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। खासकर उन अभिभावकों के लिए, जो जानबूझकर या अनजाने में अपने नाबालिग बच्चों को वाहन चलाने देते हैं और उनके हाथों में खतरे की चाबी थमा देते हैं।
अदालत ने साफ कहा है कि नाबालिग को वाहन चलाने देना केवल कानून तोड़ना नहीं, बल्कि एक सामाजिक अपराध है। अक्सर यह सोच बना ली जाती है कि बच्चा है, धीरे-धीरे सीख जाएगा या थोड़ी देर चलाने से कुछ नहीं होगा। लेकिन सच्चाई यह है कि आज बच्चों के हाथ में मोबाइल की तरह ही वाहन की चाबी भी आसानी से पहुंच रही है।
दिखावे और आधुनिकता की दौड़ में कई अभिभावक यह भूल जाते हैं कि सड़क कोई खेल का मैदान नहीं है। वाहन चलाने के लिए सिर्फ संतुलन या रफ्तार नहीं, बल्कि समझदारी, नियमों की जानकारी और जिम्मेदारी जरूरी होती है। ये गुण नाबालिग उम्र में पूरी तरह विकसित नहीं होते, इसी वजह से कानून ने उम्र की सीमा तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि हादसे के बाद नाबालिग होने का बहाना बनाकर सहानुभूति लेना या सामाजिक रसूख दिखाकर सजा से बचा नहीं जा सकता। कानून की नजर में जिम्मेदार वही होगा, जिसने नियम तोड़ने की छूट दी — चाहे वह माता-पिता हों, वाहन मालिक हों या फिर ढीली व्यवस्था।
कई मामलों में हादसे के बाद सबूत मिटाने, ड्राइवर बदलने या दबाव के जरिए मामले को हल्का करने की कोशिशें भी होती हैं, जो और ज्यादा चिंता की बात है।
अब समय आ गया है कि अभिभावक यह समझें कि बच्चों को सिर्फ सुविधाएं देना ही नहीं, बल्कि अनुशासन सिखाना और गलत पर “ना” कहना भी उतना ही जरूरी है। वहीं सरकार और प्रशासन को भी लाइसेंस व्यवस्था, वाहन पंजीकरण और ट्रैफिक निगरानी को और सख्त बनाना होगा।
अगर अब भी इस समस्या को नजरअंदाज किया गया, तो आने वाला हर हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही का सबूत होगा।
