
700 साल पुरानी परंपरा
यह परंपरा राजा डलदेव के बलिदान से जुड़ी हुई है। साल 1321 ईस्वी में जब राजा डलदेव अपनी सेना के साथ होली मना रहे थे, तभी जौनपुर के शासक शाह शर्की ने डलमऊ के किले पर हमला कर दिया। राजा डलदेव ने अपनी 200 सैनिकों की टुकड़ी के साथ वीरतापूर्वक लड़ाई लड़ी, लेकिन वे पखरौली गांव के पास वीरगति को प्राप्त हो गए।
होली के दिन शोक, चौथे दिन खेलते हैं रंग
राजा डलदेव की शहादत के बाद उनके समर्थकों और गांववालों ने शोक मनाने की परंपरा शुरू की, जो आज भी निभाई जा रही है।
- होली के दिन इन गांवों में कोई रंग-गुलाल नहीं उड़ाता।
- तीन दिन तक शोक मनाया जाता है।
- चौथे दिन रंगों के साथ होली खेली जाती है।
डलमऊ की ऐतिहासिक होली
डलमऊ क्षेत्र में यह परंपरा इतिहास और बलिदान की याद दिलाने वाली एक अनोखी परंपरा बन चुकी है। हर साल होली के दौरान गांववाले राजा डलदेव और उनके सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह परंपरा होली से जुड़ी भारत की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक मानी जाती है।
