तेहरान/जिनेवा:
मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध की आंच के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शुक्रवार को होने जा रही जिनेवा परमाणु वार्ता में भाग लेने की पुष्टि की है। इस बैठक में फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। यह वार्ता उस वक्त हो रही है जब इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष अपने चरम पर है।
🔍 क्यों अहम है यह जिनेवा बैठक?
जिनेवा में 20 जून को होने वाली इस वार्ता को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें टिकी हुई हैं। पश्चिमी देशों को आशंका है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के माध्यम से परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है।
हालांकि, ईरान का पक्ष साफ है — उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और ऊर्जा व चिकित्सा उपयोगों के लिए है।
⚠️ तनावपूर्ण पृष्ठभूमि में हो रही बातचीत
वर्तमान में गाजा में इजरायल-हमास संघर्ष और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल इस वार्ता को और भी संवेदनशील और निर्णायक बना रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बैठक में कोई ठोस समझौता नहीं होता, तो:
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ईरान और पश्चिमी देशों के बीच कूटनीतिक खाई और गहराएगी।
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ईरान-इजरायल युद्ध और भयंकर रूप ले सकता है।
☎️ पुतिन-जिनपिंग की कूटनीतिक सक्रियता
इस बीच, रूस और चीन भी इस तनावपूर्ण स्थिति में कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश में जुटे हैं। हाल ही में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने टेलीफोन पर वार्ता की और:
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इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों की निंदा की,
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बल प्रयोग के बजाय संवाद और समझौते को ही समाधान बताया।
✍️ निष्कर्ष
ईरानी विदेश मंत्री का जिनेवा वार्ता में शामिल होना दर्शाता है कि, जंग के हालात के बीच भी राजनयिक दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। यह वार्ता न सिर्फ ईरान के परमाणु भविष्य को दिशा दे सकती है, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र की शांति और स्थिरता के लिए भी एक मील का पत्थर बन सकती है।

