
न्यायालय ने साफ कहा कि जब निचली दोनों अदालतें तथ्यों के आधार पर एक जैसा फैसला दे चुकी हों, तो सिर्फ सबूतों की दोबारा जांच के लिए धारा 100 सीपीसी के तहत हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपक खोत ने की।
क्या था मामला?
अनिल कुमार गर्ग ने 24,219 रुपये के बिजली बिल को गलत बताते हुए अदालत में वाद दायर किया था। उनका आरोप था कि बिजली विभाग ने बिना सही निरीक्षण किए अधिक लोड और अनियमित उपयोग का आरोप लगाकर बिल जारी किया। साथ ही मीटर को गलत तरीके से छेड़छाड़ किया हुआ बताया गया।
निचली अदालतों का फैसला
ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि वादी ने अपने पक्ष में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी माना कि वादी को पर्याप्त मौके दिए गए, लेकिन वह साक्ष्य देने के लिए उपस्थित नहीं हुआ।
अदालत ने यह भी कहा कि संशोधन आवेदन केवल कार्यवाही को लंबा खींचने के उद्देश्य से किया गया था।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों निचली अदालतों के फैसले तथ्य आधारित हैं और उनमें कोई कानूनी गलती नहीं है। द्वितीय अपील में तभी दखल दिया जा सकता है जब कोई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न सामने आए, जो इस मामले में नहीं पाया गया।
इस तरह 21 साल से चल रही कानूनी लड़ाई का अंत हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ हो गया।
