दिल्ली हाई कोर्ट ने अजमेर शरीफ दरगाह के वित्तीय खातों की ऑडिट प्रक्रिया को लेकर कैग (CAG) से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। अदालत का रुख स्पष्ट है – वह चाहती है कि दरगाह के आर्थिक लेनदेन की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
क्या है अदालत की मंशा?
जस्टिस सचिन दत्ता की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अदालत दरगाह के खातों की कैग से ऑडिट करवाने के पक्ष में है, लेकिन प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है। कोर्ट ने कैग के वकील से निर्देश लेकर अगली सुनवाई में अपनी स्थिति साफ-साफ रखने को कहा है।
न्यायाधीश ने सवाल किया:
“क्या आपने ऑडिट शुरू किया है या नहीं? आपके हलफनामे में कहा गया है कि अब तक ऑडिट की शुरुआत नहीं हुई है। क्या इसे अदालत के रिकॉर्ड पर लिया जाए?”
दरगाह पक्ष की आपत्ति क्या है?
दरगाह की ओर से वकील ने कोर्ट को बताया कि कैग ने ऑडिट से पहले कोई स्पष्ट शर्तें नहीं बताई हैं। उनका आरोप है कि बिना किसी औपचारिक सूचना के ऑडिट पैनल का गठन कर दिया गया और दरगाह कार्यालय में “अनधिकृत जांच” की गई।
दरगाह का कहना है कि यह प्रक्रिया न सिर्फ डीपीसी अधिनियम बल्कि सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के प्रावधानों के भी खिलाफ है। उनका तर्क है कि अगर ऑडिट होनी है तो वह विधिसम्मत तरीके से की जानी चाहिए।
कैग की भूमिका पर सवाल
दरगाह की याचिका में आरोप लगाया गया कि कैग के अधिकारी बिना सूचना के कार्यालय पहुंचे और फाइलें देखने लगे। इस पर हाई कोर्ट ने कैग को निर्देश दिया कि वह स्पष्ट करे कि क्या यह प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी और क्या दरगाह को ऑडिट की शर्तों से अवगत कराया गया था।
अब आगे क्या?
अदालत ने इस पूरे मामले में 7 मई 2025 को अगली सुनवाई तय की है। तब तक कैग से यह अपेक्षा की गई है कि वह अपने स्टैंड को औपचारिक रूप से कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करे।
निष्कर्ष:
यह मामला केवल एक धार्मिक संस्था की फंडिंग से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसमें पारदर्शिता, विधिक प्रक्रिया और प्रशासनिक अधिकारों के दायरे को लेकर भी अहम बहस शामिल है। अजमेर शरीफ दरगाह, जो पूरे देश में आस्था का केंद्र है, यदि उसके वित्तीय लेन-देन की जांच हो रही है तो यह संविधान के दायरे में रहकर ही होनी चाहिए — यही अदालत का भी संकेत है।

