
अभिभावकों की बढ़ी चिंता
इस शर्त से अभिभावक परेशान हैं। कई लोग दुविधा में हैं कि बच्चों का एडमिशन कराएं या नहीं। यह नियम छोटे बच्चों पर बेवजह मानसिक दबाव डाल रहा है। कई बड़े स्कूलों में जहां अब भी सीटें खाली हैं, वहां ऐसे गारंटी पत्र भरवाए जा रहे हैं।
शिक्षा के अधिकार कानून के खिलाफ
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RTE (शिक्षा का अधिकार अधिनियम) के तहत कोई भी स्कूल बच्चे को पढ़ाई से मना नहीं कर सकता और कोई शर्त नहीं रख सकता।
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सरकार जरूरतमंद बच्चों को बिना गारंटी निजी स्कूलों में पढ़ने का मौका देती है।
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8वीं कक्षा तक के बच्चों को फेल नहीं किया जा सकता, फिर भी कई स्कूल 5वीं तक के बच्चों से यह शर्त मांग रहे हैं।
स्कूलों का बचाव और अधिकारियों की राय
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एक निजी स्कूल की प्रिंसिपल मंजू शर्मा ने कहा, “हम अभिभावकों पर दबाव नहीं डालते, बस बच्चों में पढ़ाई का रुचि बनी रहे, इसके लिए ऐसा कर रहे हैं।”
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वहीं पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी राजेन्द्र हंस ने साफ कहा कि, “कोई स्कूल ऐसी शर्त नहीं रख सकता, यह नियम के खिलाफ है। विभाग को ऐसे स्कूलों पर कार्रवाई करनी चाहिए।”
सीबीएसई की सोच के उलट
एक ओर जहां CBSE साल में दो बार परीक्षा की योजना बना रहा है ताकि बच्चों पर पढ़ाई का बोझ कम हो, वहीं दूसरी तरफ ये स्कूल बच्चों पर रिजल्ट की शर्तों का दबाव बना रहे हैं।
अभिभावकों ने की शिकायत
इस नियम के खिलाफ कई अभिभावकों ने शिक्षा विभाग में शिकायत की है। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही ऐसे स्कूलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
निष्कर्ष: शिक्षा बच्चों का अधिकार है, न कि उनके लिए तनाव का कारण। ऐसे नियम बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा उनके मनोबल को चोट पहुंचा सकते हैं।
