
मध्यप्रदेश में 9 साल बाद सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन मिलने का रास्ता खुल गया है। लेकिन नई प्रमोशन नीति को लेकर कर्मचारी संगठन दो गुटों में बंट गए हैं। एक ओर कुछ संगठन इसका विरोध कर रहे हैं, तो दूसरी ओर कुछ संगठन इसे कर्मचारियों के हित में बता रहे हैं।
क्या है मामला?
सरकार ने हाल ही में नई प्रमोशन नीति लागू की है, जिससे अब कर्मचारियों की पदोन्नति प्रक्रिया फिर से शुरू हो पाएगी। इसी को लेकर आज सामान्य प्रशासन विभाग ने विभागीय अधिकारियों और विभागाध्यक्षों की बैठक बुलाई है।
विरोध कर रहे संगठन
सपाक्स और मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ ने इस नीति का विरोध किया है।
इन संगठनों ने तय किया है कि 26 जून को वल्लभ भवन-1 के मेन गेट पर लंच टाइम में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।
इससे पहले विरोध के तौर पर कर्मचारी “पदोन्नति नीति के विरोध” की टोपी पहनकर ड्यूटी पर आ रहे हैं।
समर्थन में भी सामने आए संगठन
वहीं, मध्यप्रदेश कर्मचारी मंच के अध्यक्ष अशोक पांडेय ने विरोध को गलत बताया है। उन्होंने कहा कि
“9 साल से कर्मचारी प्रमोशन से वंचित थे। लगभग डेढ़ लाख अधिकारी-कर्मचारी बिना प्रमोशन के रिटायर हो गए। उन्हें न पद मिला, न वेतन बढ़ा। अब सरकार ने अच्छा कदम उठाया है, इसे विरोध नहीं, स्वागत मिलना चाहिए।”
आगे क्या होगा?
सरकार की ओर से 26 जून को पहली बैठक आयोजित की गई है, जिसमें पदोन्नति से जुड़ी प्रक्रिया पर आगे की रणनीति तय की जाएगी। वहीं, विरोध कर रहे संगठनों ने भविष्य में और आंदोलन करने का भी संकेत दिया है।
निष्कर्ष:
नई प्रमोशन नीति को लेकर मध्यप्रदेश में कर्मचारियों के बीच विचारों का टकराव सामने आया है। अब देखना होगा कि सरकार इस विवाद को किस तरह सुलझाती है और क्या कर्मचारी संगठनों के बीच सहमति बन पाती है।
