
किशोर पारख का यह कदम उनके हौंसले और जज़्बे को दर्शाता है। इस सफलता से वे उन लोगों के लिए प्रेरणा बन गए हैं जो अपनी इच्छाओं को उम्र के साथ छोड़ देते हैं। विश्व माउंटेन दिवस के मौके पर पत्रिका ने उनसे बात की और जाना कि उन्होंने यह लक्ष्य कैसे प्राप्त किया।
बचपन का सपना हुआ पूरा
किशोर पारख बताते हैं कि उनका बचपन से ही सपना था कि वह हिमालय की किसी चोटी पर चढ़े, लेकिन उन्हें इसके लिए मार्गदर्शन नहीं मिल पाया। उनके सपने को पंख तब लगे जब उनके एक दोस्त ने हिमालयन रेंज की चोटी पर चढ़ाने का कैंप शुरू किया। इसके बाद बस्तर की माउंटेनर नैनासिंह धाकड़ से मार्गदर्शन प्राप्त कर उन्होंने अपने सपने को साकार किया।
पांगर्छुल्ला चोटी की चढ़ाई
किशोर ने पांगर्छुल्ला चोटी पर तिरंगा लहराने के लिए 5 और 6 मई की रात को चढ़ाई शुरू की। बेस कैप से 6 किलोमीटर की कठिन चढ़ाई करते हुए वे और उनका दल छठे दिन पांगर्छुल्ला चोटी पर पहुंचे और सफलतापूर्वक चढ़ाई की। यह चोटी 15 हजार फीट से ज्यादा ऊंची है।
200 किलोमीटर से ज्यादा की पैदल यात्रा
किशोर पारख समाजसेवी के रूप में भी सक्रिय हैं। वे बस्तर के हित में कई आंदोलनों में भाग लेते रहे हैं। इंद्रावती बचाओ मंच के साथ उन्होंने 100 किलोमीटर से ज्यादा पैदल यात्रा की, और रावघाट रेल लाइन के लिए भी 200 किलोमीटर से ज्यादा की पदयात्रा की। वे बस्तर में समाजसेवा और विभिन्न आंदोलनों से जुड़े हुए हैं।
