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आपातकाल: जब सत्ता की लालसा ने कुचल दिया संविधान

लेखक: प्रेम शुक्ल, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भाजपा

25 जून 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में काले दिन के रूप में याद किया जाता है। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की, जिससे देश का संविधान बंधक बन गया और लोकतंत्र की आत्मा को कुचल दिया गया।

सत्ता के लिए कुर्बान हुआ संविधान

इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए संविधान के मूल सिद्धांतों की परवाह नहीं की। अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) को नष्ट कर दिया गया। जनता को न बोलने की आजादी रही, न प्रदर्शन करने का हक, और न ही न्यायालय में अपील करने का अधिकार।

इंदिरा गांधी ने अनुच्छेद 352 का इस्तेमाल करके आंतरिक विरोध को दबाने के लिए आपातकाल लगा दिया, जो असल में युद्ध जैसे हालात के लिए बनाया गया था। उनकी सत्ता की भूख इतनी थी कि उन्होंने सभी विरोधी नेताओं को 25 जून की रात गिरफ्तार करा दिया

न्यायपालिका पर भी हुआ हमला

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका को कमजोर करने के लिए कई संशोधन किए।

  • 42वां संविधान संशोधन (1976) ने न्यायपालिका की शक्तियों को घटा दिया।

  • 38वां संशोधन ने कोर्ट को आपातकाल की समीक्षा करने से रोक दिया।

  • 39वां संशोधन केवल प्रधानमंत्री को बचाने के लिए किया गया।

इन सबका मकसद था कि कोई भी इंदिरा गांधी की सत्ता को चुनौती न दे सके।

जनता के अधिकारों पर हमला

आपातकाल के दौरान लोगों को जीने का अधिकार तक नहीं रहा। लाखों गरीब पुरुषों की जबरन नसबंदी कर दी गई। यह कार्य इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी की देखरेख में हुआ। पुलिस और प्रशासन को यह आदेश दिया गया कि जो व्यक्ति नसबंदी न कराए, उसे जबरन पकड़ा जाए।
इसका नाम जनसंख्या नियंत्रण अभियान रखा गया, लेकिन असल में यह नागरिकों की शारीरिक और मानसिक आजादी पर हमला था।

भाजपा की प्रतिबद्धता

आज जब हम आपातकाल के उस अंधेरे दौर को याद करते हैं, तो यह साफ होता है कि वह सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं था, बल्कि संविधान और नागरिक अधिकारों पर हमला था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 11 जुलाई 2024 को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है, ताकि देश की नई पीढ़ी उस समय की तानाशाही और अन्याय को जान सके।

भाजपा आज संविधान की रक्षा और सम्मान के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हमारा कर्तव्य है कि हम ऐसी गलतियां फिर न दोहराएं, और लोकतंत्र को हर हाल में बचाकर रखें।

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