हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच सीज़फायर की घोषणा के बावजूद यह चर्चा फिर तेज़ हो गई कि तुर्की हमेशा पाकिस्तान के पक्ष में क्यों खड़ा दिखाई देता है। जबकि वैश्विक मंच पर कई देश इस संघर्ष में तटस्थ रुख अपनाते हैं, तुर्की ने पाकिस्तान और इसराइल ने भारत का स्पष्ट समर्थन किया।
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने पाकिस्तान को “भाई” बताते हुए उनके लिए दुआ करने की बात कही, और तुर्की के सैन्य विमान तथा युद्धपोत पाकिस्तान पहुंचने के कारणों को औपचारिक सहयोग बताया। लेकिन भारतीय सेना के अनुसार, पाकिस्तान ने हाल ही में तुर्की निर्मित सैकड़ों ड्रोन का इस्तेमाल भारत पर हमलों के लिए किया।
इतिहास, विचारधारा और रणनीतिक हित
भारत के पूर्व राजदूत तलमीज़ अहमद के अनुसार, तुर्की और पाकिस्तान के रिश्ते केवल धार्मिक आधार पर नहीं टिके हैं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी दोनों देश सुरक्षा मामलों में करीबी सहयोगी रहे हैं। शीत युद्ध के समय से ही दोनों देश अमेरिका के साझेदार रहे हैं और सैन्य आदान-प्रदान लगातार चलता रहा है।
अर्दोआन ने अपने शासनकाल में खुद को एक इस्लामिक नेता के तौर पर पेश किया है और कश्मीर मुद्दे को अक्सर इस्लामी दृष्टिकोण से उठाया है। यही कारण है कि भारत और तुर्की के रिश्तों में हमेशा एक असहजता बनी रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक तुर्की का दौरा नहीं किया है, जो इस दूरी का प्रतीक है।
सिर्फ वैचारिक नहीं, रणनीतिक समीकरण भी
भारत में पूर्व राजदूत नवदीप सूरी का मानना है कि तुर्की को पाकिस्तान में एक बड़ा रक्षा बाजार मिल रहा है। इसके अलावा तुर्की इस्लामी दुनिया में नेतृत्व के लिए प्रयासरत है और पाकिस्तान जैसे एकमात्र मुस्लिम परमाणु शक्ति देश का समर्थन उसके लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश है।
इस्लामिक दुनिया में नेतृत्व को लेकर तुर्की और सऊदी अरब के बीच भी प्रतिस्पर्धा है। अर्दोआन ने मलेशिया, ईरान और पाकिस्तान के साथ मिलकर एक वैकल्पिक इस्लामिक संगठन बनाने की कोशिश की थी, लेकिन सऊदी अरब के दबाव में पाकिस्तान पीछे हट गया।
तुर्की का समर्थन भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण?
हालांकि तुर्की का पाकिस्तान के साथ खड़ा होना भारत के लिए रणनीतिक रूप से असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन इसे बड़ा झटका मानना सही नहीं होगा। भारत के पश्चिम एशिया में संबंध इसराइल, सऊदी अरब, कतर, यूएई और ईरान जैसे देशों से काफी गहरे और बहुआयामी हैं।
कश्मीर मुद्दे पर तुर्की की आलोचना और ओआईसी का पाकिस्तान-समर्थक रवैया भारत को असहज करता है, लेकिन भारत की ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा प्राथमिकताएं खाड़ी देशों और इसराइल के साथ जुड़ी हैं। इसीलिए तुर्की की स्थिति भारत की व्यापक विदेश नीति पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं डालती।
एकजुटता का वैचारिक और भू-राजनीतिक आधार
तुर्की, पाकिस्तान और अज़रबैजान की तिकड़ी एक खास वैचारिक और रणनीतिक संबंध साझा करती है। जैसे तुर्की कश्मीर पर पाकिस्तान का समर्थन करता है, वैसे ही पाकिस्तान नागोर्नो-काराबाख पर अज़रबैजान के पक्ष में खड़ा होता है। पाकिस्तान अब भी आर्मीनिया को एक देश के रूप में मान्यता नहीं देता।
2019 में तुर्की के राष्ट्रपति के पाकिस्तान दौरे के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने तुर्की और भारत के “इतिहास” का हवाला देते हुए कहा था कि तुर्कों ने भारत पर 600 वर्षों तक शासन किया। इस पर कई इतिहासकारों ने उन्हें तथ्यों की अनदेखी और साम्प्रदायिक नजरिए के लिए आलोचना भी की।
निष्कर्ष: धार्मिकता से परे भू-राजनीति
तुर्की और पाकिस्तान की साझेदारी केवल मज़हब तक सीमित नहीं है, यह सामरिक, आर्थिक और वैश्विक शक्ति संतुलन का हिस्सा है। इस्लाम एक भावनात्मक जुड़ाव जरूर देता है, लेकिन असल प्रेरणा राजनीतिक व सैन्य सहयोग और क्षेत्रीय प्रभुत्व की चाहत है। भारत के लिए यह गठजोड़ चिंता का विषय हो सकता है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उसके मध्य-पूर्वी और वैश्विक साझेदारों के साथ संबंध हैं।
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