भारत की युवा और प्रतिभाशाली शतरंज खिलाड़ी दिव्या देशमुख ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपने खेल के बारे में खुलकर बात की। चेस वर्ल्ड कप चैंपियन बनने के बाद उन्होंने बताया कि वह हमेशा आक्रामक खेलने में विश्वास करती हैं और मैच के दौरान दबाव को खुद पर हावी नहीं होने देतीं।
दिव्या ने कहा, “मैं आक्रामक खिलाड़ी हूं। जब मैं बोर्ड पर बैठती हूं, तो दिमाग में बस एक ही चीज़ होती है – जीतना है। मैं इस बात की ज्यादा चिंता नहीं करती कि सामने वाला कौन है या क्या सोचेगा। मेरा फोकस सिर्फ अपनी चालों और गेम प्लान पर होता है।” शतरंज जैसे मानसिक खेल में दबाव एक आम बात है, लेकिन दिव्या का मानना है कि अगर खिलाड़ी खुद पर भरोसा रखे, तो किसी भी स्थिति से निकल सकता है। उन्होंने कहा, “मैं मैच के दबाव को ज्यादा सिर पर नहीं लेती। अगर आप पहले से सोचेंगे कि हार सकते हैं या गलती हो सकती है, तो आप खुद को कमजोर बना लेते हैं। मैं कोशिश करती हूं कि पॉजिटिव सोच के साथ खेलूं।”
दिव्या देशमुख ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी कड़ी मेहनत और माता-पिता के सहयोग को दिया। उन्होंने कहा कि वह रोज़ाना कई घंटे शतरंज की प्रैक्टिस करती हैं और मानसिक तौर पर खुद को मजबूत बनाए रखने की कोशिश करती हैं। दिव्या ने ये भी बताया कि वह अपने कोच की सलाह को बहुत गंभीरता से लेती हैं और लगातार अपने गेम को सुधारने में लगी रहती हैं।
17 साल की उम्र में दिव्या ने जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वह कई युवा खिलाड़ियों को प्रेरित कर रही हैं। खासतौर पर लड़कियों के लिए वह एक मिसाल बन गई हैं कि अगर जुनून और लगन हो, तो किसी भी फील्ड में ऊंचाइयों तक पहुंचा जा सकता है।
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