पोप फ्रांसिस, जिनका हाल ही में 88 वर्ष की उम्र में वेटिकन सिटी स्थित अपने निवास ‘कासा सांता मार्टा’ में निधन हो गया, न केवल अपने सादगीभरे जीवन के लिए जाने जाते थे, बल्कि उनके पहनावे — खासकर उनके लाल जूतों — को लेकर भी चर्चाओं में रहते थे। आखिर क्या वजह थी कि उन्होंने हमेशा लाल रंग के जूते ही पहने? इसके पीछे एक गहरी धार्मिक परंपरा और ऐतिहासिक कहानी जुड़ी हुई है।
लाल जूते: सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक
कैथोलिक परंपरा में लाल रंग बलिदान और ईसा मसीह के दुःख-सहने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यह रंग उन शहीदों के खून की याद दिलाता है जिन्होंने चर्च और ईसाई धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ऐसे में पोप द्वारा लाल जूते पहनना केवल एक परिधान नहीं, बल्कि एक धार्मिक श्रद्धा और प्रतीकात्मकता है।
परंपरा की शुरुआत कैसे हुई?
इस परंपरा को विशेष पहचान 2003 में मिली, जब एक प्रसिद्ध इतालवी मोची एंटोनियो अरेलानों ने वेटिकन में लाल चमड़े से बने जूते भेजे। सबसे पहले इन जूतों को पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने पहना और यह उनके कार्यकाल की एक विशेष पहचान बन गए। इसके बाद, जब 2013 में पोप फ्रांसिस ने पोप पद ग्रहण किया, तो उन्होंने भी इस परंपरा को जारी रखा।
एक खास मुलाकात
एक इंटरव्यू में एंटोनियो अरेलानों ने साझा किया कि जब वे आम दर्शन सभा में पोप से मिले तो पोप ने उन्हें पहचानते हुए कहा, “यह मेरे शूमेकर हैं!” यह क्षण उनके लिए गर्व से भरा था और यह बताता है कि यह परंपरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि गहरे व्यक्तिगत संबंध और श्रद्धा से जुड़ी हुई थी।
पोप बनने से पहले की सादगी
पोप फ्रांसिस, अपने पोप बनने से पहले, चर्च से किसी भी प्रकार का आर्थिक लाभ नहीं लेते थे। वे हमेशा सादा जीवन जीने के पक्षधर रहे और यही गुण उन्हें दुनिया भर में लोगों का प्रिय बना गया। उनके पहनावे में भी यही सादगी दिखाई देती थी, जिसे उन्होंने लाल जूतों की परंपरा से संतुलित किया।
निष्कर्ष
पोप द्वारा लाल जूते पहनना एक प्राचीन धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जो न केवल इतिहास और आस्था से जुड़ा है बल्कि एक प्रेरणा भी देता है कि कैसे प्रतीकात्मक वस्तुएं भी हमारे विश्वास को जीवित रखती हैं। पोप फ्रांसिस की सादगी और उनकी आस्था ने उन्हें न केवल चर्च का, बल्कि लाखों दिलों का पोप बना दिया।
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