
कोर्ट ने क्या कहा?
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हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार धन की कमी का बहाना नहीं बना सकती, लोगों की जान बचाना सबसे जरूरी है।
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कोर्ट ने इस मामले में स्वप्रेरणा से जनहित याचिका दर्ज की है।
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कोर्ट ने साफ कहा कि पिछले साल दिए गए निर्देशों को नजरअंदाज करना गंभीर लापरवाही है।
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इंसानों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता और न ही अधिकारी खुद को कानून से ऊपर मान सकते हैं।
क्या निर्देश दिए गए?
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सभी जिला कलक्टरों से 7 दिन में रिपोर्ट मांगी गई है कि उन्होंने अदालत के निर्देशों का पालन किया या नहीं।
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मुख्य सचिव को निर्देश दिया गया है कि वह समन्वय समिति बनाए और लू से बचाव की कार्ययोजना तैयार करे।
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10 शीर्ष अधिकारियों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा गया है, जिनमें केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी भी शामिल हैं।
कोर्ट ने सुझाए ये उपाय:
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सड़कों के किनारे पेड़ लगाए जाएं और हरित क्षेत्र विकसित किए जाएं।
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लू और ठंड से बचाव वाला कानून (Heat & Cold Wave Act, 2015) लागू किया जाए।
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दोपहर 12 से 3 बजे तक श्रमिकों को आराम की अनुमति मिले।
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ORS, आम पना और पीने के पानी की व्यवस्था इंसानों और जानवरों दोनों के लिए की जाए।
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स्वास्थ्य केंद्रों में लू से बचाव की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं।
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SMS, रेडियो, मोबाइल ऐप और सोशल मीडिया से लू के अलर्ट दिए जाएं।
कोर्ट का सख्त संदेश
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कोर्ट ने कहा कि 10 महीनों में कोई योजना नहीं बनाना लापरवाही है।
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अगर अब भी कोई कार्रवाई नहीं की गई तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
किन लोगों से सहयोग मांगा?
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अदालत ने कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं और अधिकारियों से कहा कि वे इस मामले में कोर्ट की मदद करें, ताकि जनता की जान सुरक्षित रहे।
निष्कर्ष:
राजस्थान में बढ़ती गर्मी और लू को लेकर अब हाईकोर्ट गंभीर हो गया है। सरकार और अधिकारियों को जल्द से जल्द ठोस कदम उठाने होंगे, वरना सख्त कार्रवाई तय है।
