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राजस्थान में भालू के शिकार पर उलझन, दो अलग नियमों के कारण शिकारी बच जाते हैं

जयपुर। राजस्थान में भालू को भारतीय वन अधिनियम में दो अलग-अलग श्रेणियों में शामिल करने से असमंजस की स्थिति बनी हुई है। भालू को प्रथम श्रेणी और द्वितीय श्रेणी, दोनों में रखा गया है, जिससे शिकारियों को कानूनी राहत मिल जाती है।

भालू दो श्रेणियों में क्यों शामिल है?

भारतीय वन अधिनियम 1971 के तहत वन्यजीवों को उनकी संख्या और महत्व के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है।

  • प्रथम श्रेणी: इसमें दुर्लभ वन्यजीव आते हैं, जिनका शिकार करने पर 3 से 7 साल तक की सजा और 25 हजार रुपये तक का जुर्माना होता है। इन मामलों में जमानत नहीं मिलती।
  • द्वितीय श्रेणी: इसमें साधारण वन्यजीव आते हैं, और इनके शिकार के मामलों में सजा थोड़ी हल्की होती है। आरोपी जमानत लेकर बच सकते हैं।

पहले भालू को द्वितीय श्रेणी में रखा गया था, लेकिन जब इनकी संख्या कम होने लगी, तो इसे प्रथम श्रेणी में भी शामिल कर दिया गया। हालांकि, अब भी यह द्वितीय श्रेणी में दर्ज है, जिससे कानूनी दांव-पेंच के कारण कई शिकारी सजा से बच जाते हैं।

अधिनियम में बदलाव

वन अधिनियम 1971 में अब तक तीन बार बदलाव हो चुके हैं, और आखिरी बार 2006 में इसे संशोधित किया गया था। तब भालू को दोनों श्रेणियों में रखा गया, जिससे आज तक यह उलझन बनी हुई है।

कानूनी दिक्कतें

वन विभाग का कहना है कि इस समस्या का समाधान सरकार को करना होगा, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया में भालू दोनों श्रेणियों में दर्ज है, जिससे कई बार शिकारी कानूनी खामियों का फायदा उठाकर छूट जाते हैं।

संजीव शर्मा, उपवन संरक्षक, रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व ने बताया कि इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए नीतिगत बदलाव जरूरी हैं।

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