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आतंक के साये में पला पाकिस्तान का DG ISPR? पिता पर हैं लादेन से जुड़ाव के गंभीर आरोप

भारत-पाकिस्तान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने भारत पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि जिस अधिकारी ने भारत पर यह आरोप लगाया है, उसका खुद का पारिवारिक इतिहास आतंक से गहराई से जुड़ा हुआ है।

कौन हैं मेजर जनरल अहमद शरीफ चौधरी?

मेजर जनरल अहमद शरीफ चौधरी इस समय पाकिस्तान की सेना की मीडिया इकाई ISPR (Inter-Services Public Relations) के प्रमुख हैं। वे सेना के इलेक्ट्रिकल एंड मैकेनिकल इंजीनियरिंग कोर से आते हैं और इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा विज्ञान संगठन DESTO के प्रमुख भी रह चुके हैं — वह संगठन जिस पर अमेरिका कई बार तकनीकी प्रतिबंध लगा चुका है।

पिता का अतीत – विज्ञान से आतंक तक

अहमद शरीफ के पिता डॉ. सुल्तान बशीरुद्दीन महमूद, कभी पाकिस्तान के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों में से एक हुआ करते थे। उन्हें देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान सितारा-ए-इम्तियाज़ भी मिला। लेकिन बाद में उनका झुकाव धार्मिक कट्टरता और आतंकवादी संगठनों की ओर हो गया।

साल 2000 में उन्होंने Ummah Tameer-e-Nau (UTN) नामक संगठन की स्थापना की, जिसका मकसद तालिबान और अल-कायदा जैसे संगठनों को वित्तीय, तकनीकी और रणनीतिक सहयोग देना था। अमेरिकी और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने ओसामा बिन लादेन को न्यूक्लियर और बायोलॉजिकल हथियारों से संबंधित जानकारी दी थी।

जब विज्ञान से फिसलकर जिहाद तक पहुँचा एक दिमाग

डॉ. बशीरुद्दीन महमूद के विचार आम वैज्ञानिकों से बिल्कुल अलग थे। उन्होंने एक किताब लिखी — Mechanics of the Doomsday and Life after Death, जिसमें उन्होंने दावा किया कि जिन्न ऊर्जा का एक रूप हैं जिन्हें बिजली उत्पादन में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा, उन्होंने सूरज की गतिविधियों को ऐतिहासिक क्रांतियों से जोड़ने की अजीबोगरीब थ्योरी भी दी थी। एक अमेरिकी अफसर ने उन्हें “ज्यादा समझदार लेकिन पूरी तरह भ्रमित” बताया था।

कट्टरता के साये में तैयार हुआ अगला अधिकारी?

अहमद शरीफ चौधरी ने सार्वजनिक रूप से कभी अपने पिता की विचारधारा का समर्थन नहीं किया, लेकिन जिस दौर और माहौल में वे बड़े हुए — यानी ज़िया-उल-हक के शासन में — वहाँ धार्मिक चरमपंथ और राष्ट्रवाद को खुलकर बढ़ावा दिया जाता था। यह सवाल आज भी बना हुआ है कि क्या पाकिस्तान सेना के उच्च अधिकारी खुद को कट्टर सोच से अलग रख पा रहे हैं?

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