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पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर अत्याचार जारी, ईद पर भी नहीं मिली धार्मिक आज़ादी लाहौर – पाकिस्ता

न में अल्पसंख्यक अहमदिया मुसलमानों के साथ होने वाला भेदभाव एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला उस समय सामने आया जब ईद-उल-अजहा (बकरीद) जैसे पवित्र मौके पर भी अहमदिया समुदाय को नमाज अदा करने और धार्मिक परंपराओं का पालन करने से रोका गया

✋ धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला

पंजाब प्रांत में पुलिस ने दो अहमदिया नागरिकों को पशु बलि करने के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लिया, जबकि तीन अन्य के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।
जमात-ए-अहमदिया पाकिस्तान (JAP) के अनुसार, तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) जैसे कट्टरपंथी संगठनों के दबाव में अहमदियों को अपनी धार्मिक पहचान छोड़ने के लिए भी मजबूर किया गया।


📍 कई शहरों में रोकी गई ईद की नमाज

रिपोर्ट के अनुसार, खुशाब, मीरपुर खास, लोधरान, भक्कर, राजनपुर, उमरकोट, लरकाना और कराची में अहमदिया समुदाय के लोगों को ईद की नमाज पढ़ने से रोक दिया गया।
यहाँ तक कि लाहौर के ऐतिहासिक गरी शाहू स्थित अहमदिया उपासना स्थल पर भी TLP कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और उसे बंद करने की मांग की। पुलिस ने दबाव में आकर उस स्थान को सील कर दिया।


🧠 कौन हैं अहमदिया मुसलमान?

अहमदिया आंदोलन की स्थापना 1889 में मिर्जा गुलाम अहमद ने की थी। यह समुदाय इस्लाम के बुनियादी स्तंभों – नमाज, रोजा, जकात, हज और तौहीद – का पालन करता है, लेकिन उनका मानना है कि मिर्जा गुलाम अहमद ईश्वर द्वारा नियुक्त एक पैगंबर थे।
मुख्यधारा के मुसलमानों के लिए यह विचार विवादास्पद है, क्योंकि इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद को ‘खातिमुन्नबीयीन’ यानी अंतिम पैगंबर माना जाता है।


📉 समुदाय पर लगातार गिरता भरोसा

पाकिस्तान की कुल जनसंख्या लगभग 25 करोड़ है, जिनमें अहमदियों की संख्या सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब 5 लाख है, जबकि कुछ स्वतंत्र स्रोतों के अनुसार यह संख्या 40 लाख तक हो सकती है।
2018 में पाकिस्तान चुनाव आयोग के आंकड़ों में 1.67 लाख अहमदिया मतदाता दर्ज किए गए थे। लेकिन बढ़ते अत्याचारों के चलते बड़ी संख्या में अहमदिया पाकिस्तान से पलायन कर चुके हैं


⚠️ क्या यह सिर्फ धार्मिक असहिष्णुता है?

पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के खिलाफ लंबे समय से सामाजिक बहिष्कार, कानूनी प्रतिबंध और हिंसा का माहौल बना हुआ है।
1974 में पाकिस्तान की संसद ने उन्हें गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया था, और इसके बाद से उनके लिए धार्मिक स्वतंत्रता सीमित होती चली गई है।

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