20 जून 2025
2024 का अंत पश्चिम एशिया में रूस के लिए झटका लेकर आया, जब सीरिया में बशर अल असद की सरकार गिर गई। असद को रूस में शरण लेनी पड़ी — और इससे साफ हुआ कि इस क्षेत्र में मॉस्को का प्रभाव लगातार घट रहा है।
अब 2025 में, ईरान और इसराइल के बीच छिड़े युद्ध ने रूस के लिए एक और रणनीतिक संकट पैदा कर दिया है। अमेरिका इसराइल के साथ मजबूती से खड़ा है, और अगर ईरान भी सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ता है, तो पश्चिम एशिया में रूस की बची-खुची मौजूदगी भी खतरे में पड़ सकती है।
रूस क्यों नहीं दे रहा है ईरान को सक्रिय समर्थन?
हालांकि रूस और ईरान के बीच एक रणनीतिक साझेदारी समझौता इस साल की शुरुआत में हुआ था, लेकिन रूस की सैन्य सहायता गायब है। अब तक, मॉस्को ने केवल कूटनीतिक स्तर पर अपनी असहमति जताई है — लेकिन हथियार, सैनिक या प्रत्यक्ष समर्थन नहीं भेजा।
डॉ. राजन कुमार (एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू) इस दूरी के पीछे कई कारण गिनाते हैं:
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यूक्रेन युद्ध में उलझन: रूस खुद एक लंबी लड़ाई में है और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।
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अमेरिका से टकराव से बचाव: पुतिन अभी अमेरिका के साथ रिश्तों को और बिगाड़ना नहीं चाहते, खासकर जब ट्रंप से वार्ता की संभावना बनी हुई है।
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ईरान को हथियारों की ज़रूरत है, रूस को भी: पहले ईरान रूस को ड्रोन दे रहा था, अब हालात उलट हैं। रूस के पास ईरान को देने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है।
क्या रूस को इस संघर्ष से कोई लाभ है?
इस स्थिति में रूस कुछ अप्रत्यक्ष फायदे देख सकता है:
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तेल के दामों में वृद्धि से रूस की अर्थव्यवस्था को बढ़त मिल सकती है।
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कूटनीतिक रूप से रूस खुद को मध्य-पूर्व में “शांति-स्थापक” (Peacemaker) की भूमिका में दिखाना चाहता है।
हालांकि, अमेरिकी रणनीति रूस की इस भूमिका को कुंद करने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रपति ट्रंप फिलहाल दबाव की नीति अपना रहे हैं, और मध्यस्थता की कोई जगह फिलहाल नहीं दी जा रही।
अगर ईरान हारा तो रूस पर क्या असर होगा?
ईरान की हार के कई गंभीर भू-राजनीतिक परिणाम होंगे:
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इसराइल का वर्चस्व पश्चिम एशिया में और बढ़ेगा।
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रूस समर्थक गुटों की ताकत खत्म हो जाएगी (जैसे सीरिया और ग़ज़ा में पहले ही हुआ है)।
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रूस की प्रभावशीलता मध्य-पूर्व में लगभग समाप्त हो जाएगी।
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चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ेगा, क्योंकि उसे अमेरिकी-प्रभावित गल्फ पर ज़्यादा निर्भर रहना होगा।
क्या बहुध्रुवीय विश्व की कल्पना को झटका लगेगा?
भारत, रूस, और कई अन्य देश वर्षों से बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की बात करते आए हैं, जिसमें एक से अधिक महाशक्तियां संतुलन बनाए रखें।
लेकिन अगर अमेरिका खुले तौर पर ईरान में हस्तक्षेप करता है और ईरानी सरकार गिर जाती है, तो यह संतुलन पूरी तरह अमेरिका और इसराइल के पक्ष में चला जाएगा।
डॉ. राजन कुमार मानते हैं कि:
“ऐसे में बहुध्रुवीयता को झटका लगेगा। लेकिन ये भी तय नहीं कि अमेरिका की जीत से क्षेत्र में स्थायित्व आएगा। अफग़ानिस्तान, इराक़, लीबिया — हर जगह पश्चिमी हस्तक्षेप के बाद हालात बिगड़े ही हैं।”
ब्रिक्स और एससीओ चुप क्यों हैं?
ईरान अब BRICS और SCO का सदस्य है। इसके बावजूद इन संगठनों की ओर से कोई ठोस मदद नहीं आई है।
डॉ. राजन बताते हैं:
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ये संगठन राजनीतिक और आर्थिक सहयोग तक सीमित हैं, इनमें सैन्य दखल की व्यवस्था नहीं है।
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BRICS में लोकतांत्रिक देश भी हैं, जो अमेरिका से टकराव नहीं चाहते।
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अगर अमेरिका रूस पर सेकेंडरी सैंक्शन लगा दे, तो भारत और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं को भी नुकसान होगा।
अंत में: पुतिन के पास विकल्प क्या हैं?
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कूटनीतिक मध्यस्थता की कोशिशें तेज करना, ताकि रूस खुद को वैश्विक संतुलनकर्ता के रूप में पेश कर सके।
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तेल बाज़ार का लाभ उठाना, और अपने निर्यात को और आक्रामक बनाना।
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चीन, भारत और तुर्की के साथ तालमेल बढ़ाकर अमेरिका के एकाधिकार को चुनौती देना।
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सीमित सैन्य सहयोग का रास्ता तलाशना, जिससे ईरान को सहारा मिले और रूस पर अतिरिक्त प्रतिबंध न लगें।
निष्कर्ष:
ईरान की स्थिति इस वक्त रूस के लिए एक कूटनीतिक चुनौती और रणनीतिक खतरा दोनों है। अगर तेहरान में सत्ता पलटी, तो पुतिन का पश्चिम एशिया में प्रभाव लगभग खत्म हो सकता है। ऐसे में पुतिन के लिए यह एक ‘lose-lose’ स्थिति बनती जा रही है — जिसमें कोई भी रास्ता आसान नहीं है।
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