लाहौर/कराची/सरगोधा: पाकिस्तान में एक बार फिर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ सख्ती देखने को मिली है। अहमदिया समुदाय के लोग, जो खुद को मुसलमान मानते हैं, ईद-उल-अजहा के दिन जब परंपरागत नमाज और कुर्बानी कर रहे थे, तब उनके खिलाफ पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी। कई स्थानों पर न सिर्फ नमाज पढ़ने पर उन्हें हिरासत में लिया गया, बल्कि उनकी मस्जिदों को ताले लगाकर बंद भी कर दिया गया।
🕌 नमाज के बाद गिरफ्तारी, मस्जिद सील
पंजाब प्रांत के लाहौर के बागबानपुरा इलाके में पुलिस ने ईद की नमाज के बाद दर्जनों अहमदिया मुसलमानों को गिरफ्तार किया। ये लोग एक निजी मस्जिद में नमाज अदा कर रहे थे, जिसे बाद में पुलिस ने सील कर दिया।
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स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने अहमदिया मुसलमानों को मस्जिद से खींचकर बाहर निकाला और गाड़ियों में बिठाकर ले गई।
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कार्रवाई के दौरान तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) के कार्यकर्ता मस्जिद के बाहर नारेबाजी कर रहे थे।
🐐 कुर्बानी पर भी पाबंदी, पशु जब्त
ऐसी ही घटनाएं सरगोधा जिले के सिलनवाली कस्बे में भी दर्ज की गईं।
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जहां एक अहमदिया परिवार ने ईद पर कुर्बानी दी थी, वहां पुलिस ने घर में घुसकर जानवर को जब्त कर लिया और सरकारी गाड़ी में भरकर ले गई।
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कराची में भी TLP कार्यकर्ताओं और पुलिस की टीमों ने इसी तरह की कार्रवाई करते हुए अहमदिया परिवारों के खिलाफ छापेमारी की।
📜 कानून के नाम पर भेदभाव
पाकिस्तान में 1974 में हुए संविधान संशोधन के तहत अहमदिया समुदाय को गैर-मुस्लिम घोषित किया गया था।
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इसके बाद 1984 में जनरल जिया-उल-हक द्वारा लागू ‘ऑर्डिनेंस XX’ ने इस समुदाय पर इस्लामिक धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने पर लगभग कानूनी प्रतिबंध लगा दिया।
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इस कानून के तहत:
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नमाज पढ़ना,
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“अस्सलामुअलैकुम” कहना,
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खुद को मुसलमान बताना—
सभी को अपराध माना गया, जिसमें तीन साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।
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📢 जिन्ना का वादा, अधूरी हकीकत
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने अहमदिया मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता और बराबरी का भरोसा दिया था।
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लेकिन पाकिस्तान बनने के सिर्फ 27 साल बाद, इस समुदाय के लिए हालात पूरी तरह बदल गए।
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आज की स्थिति यह है कि अहमदिया समुदाय के लोगों को ईद जैसे धार्मिक पर्वों पर भी इबादत करने की इजाजत नहीं दी जाती।
🔍 निष्कर्ष
हर साल की तरह इस बार भी ईद-उल-अजहा के दिन अहमदिया समुदाय को उनकी धार्मिक आस्थाओं का पालन करने से रोक दिया गया।
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इस घटना ने एक बार फिर पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति और अल्पसंख्यकों के प्रति रवैये को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मसले पर प्रतिक्रिया की उम्मीद जताई जा रही है।
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