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ईरान की आर्मेनिया को खुली समर्थन की घोषणा, अज़रबैजान की रणनीति को बड़ा झटका

तेहरान/येरेवन: दक्षिण काकेशस क्षेत्र में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ईरान द्वारा अपने पड़ोसी देश आर्मेनिया को दिए जा रहे खुले समर्थन ने अज़रबैजान और उसके सहयोगी तुर्की की रणनीति को चुनौती दे डाली है। 2020 के नागोर्नो-काराबाख युद्ध के बाद से अज़रबैजान आक्रामक नीति अपना रहा था, लेकिन अब ईरान के इस हस्तक्षेप से उसकी उम्मीदों को झटका लगा है।


भारत से दूरी बनाकर अज़रबैजान ने चुनी थी पाक-तुर्की की राह

भारत के खिलाफ सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान का साथ देकर अज़रबैजान ने जिस तरह से दक्षिण एशिया की राजनीति में प्रवेश किया, उसने कई सवाल खड़े किए थे। लेकिन अब बगैर भारत के हस्तक्षेप के ही ईरान ने ऐसा कदम उठाया है जिससे अज़रबैजान की स्थिति कमजोर होती दिख रही है। पाकिस्तान और चीन जैसे पारंपरिक समर्थक भी इस मुद्दे पर खामोश हैं, जो अपने आप में संकेत देता है कि अज़रबैजान को इस बार अकेले ही खेलना होगा।


ईरान ने दोहराया – ‘सीमाएं नहीं बदलेंगी’

मंगलवार को ईरान के रक्षा मंत्री ने आर्मेनिया की राजधानी येरेवन में वहां के रक्षा प्रमुख सुरेन पापिक्यान से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा कि ईरान काकेशस क्षेत्र में सीमाओं की स्थिरता और संप्रभुता को पूरी ताकत से समर्थन देता रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की विदेश नीति आर्मेनिया के साथ दीर्घकालिक सहयोग पर केंद्रित है।


क्यों जरूरी है ईरान के लिए आर्मेनिया

ईरानी अधिकारियों के अनुसार, आर्मेनिया और ईरान के बीच सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध बेहद गहरे हैं। ईरान यह मानता है कि क्षेत्र में स्थायित्व और शांति ही प्रगति की कुंजी है। उनका यह भी कहना था कि ईरान के अंदर मुस्लिम और अर्मेनियाई समुदायों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व इस बात का प्रमाण है कि विविधता के साथ विकास संभव है।


अज़रबैजान को मुस्लिम समर्थन की उम्मीद थी, लेकिन…

अज़रबैजान यह मानकर चल रहा था कि एक मुस्लिम बहुल देश होने के नाते ईरान उसके पक्ष में खड़ा होगा। लेकिन इसके उलट, ईरान ने धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन और ऐतिहासिक संबंधों के आधार पर फैसला लिया है। इस तटस्थ और व्यावहारिक रुख ने अज़रबैजान को रणनीतिक रूप से झटका दे दिया है।


नया संतुलन, नया संदेश

ईरान का यह कदम सिर्फ अज़रबैजान या तुर्की के लिए नहीं, बल्कि उन सभी देशों के लिए एक संकेत है जो अपनी रणनीति को धार्मिक पहचान के आधार पर तय करते हैं। बदलते परिदृश्य में अब संपर्क, सहयोग और संप्रभुता का सम्मान ही कूटनीति की नई भाषा बनता जा रहा है।

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