धरती पर चाहे जितनी भी बड़ी आफ़त क्यों न आ जाए, भारत के पड़ोसी देश थाईलैंड का रुख हमेशा एक जैसा रहता है—शांति और चुप्पी। वैश्विक तनाव हो, आतंकवाद की कोई बड़ी घटना हो या फिर भारत-पाकिस्तान जैसा संवेदनशील मुद्दा, थाईलैंड की सरकार कभी खुलकर पक्ष नहीं लेती।
अब सवाल ये उठता है—आख़िर थाईलैंड ऐसा करता क्यों है?
हर मसले पर “नो कमेंट्स” वाली नीति
भारत और पाकिस्तान के बीच जब तनाव बढ़ा, तब बांग्लादेश, ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों ने सार्वजनिक रूप से बयान दिए। लेकिन थाईलैंड की ओर से केवल पहलगाम हमले की निंदा भर की गई, बाकी हर बात पर चुप्पी साध ली गई।
यही रवैया थाईलैंड ने चीन-ताइवान, चीन-जापान और अन्य कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनाया। इससे साफ है कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी विदेश नीति है।
“सोते कुत्ते को मत जगाओ” – थाईलैंड की कूटनीति
जाने-माने अंतरराष्ट्रीय मंच The Diplomat की रिपोर्ट के अनुसार, थाईलैंड की विदेश नीति उस कहावत पर टिकी है—“सोते कुत्ते को मत जगाओ”। इसका मतलब है कि किसी विवाद में टांग न अड़ाना ही बेहतर है।
थाईलैंड ना तो किसी को अपना पक्का दोस्त मानता है, ना ही किसी को दुश्मन बनाता है। इस नीति के पीछे एक बेहद व्यावहारिक कारण है—पर्यटन।
पर्यटन ही थाईलैंड की जान है
थाईलैंड की पहचान एक पर्यटन-आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में है। देश को हर साल 60 बिलियन डॉलर से अधिक की कमाई केवल टूरिज्म से होती है।
यहां दुनिया भर से पर्यटक आते हैं—चाहे वे चीन से हों, भारत से, यूरोप या अमेरिका से।
अगर थाईलैंड किसी देश का पक्ष लेता है, तो दूसरे देश के नागरिकों की नाराजगी उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए थाई सरकार हर अंतरराष्ट्रीय विवाद में तटस्थता बनाए रखना बेहतर समझती है।
बौद्ध संस्कृति का प्रभाव
थाईलैंड में बहुसंख्यक आबादी बौद्ध धर्म मानने वाली है, जिसकी शिक्षा ही शांति, संतुलन और अहिंसा पर आधारित है। यही कारण है कि देश की आम जनता भी विवादों से दूर रहना पसंद करती है।
तो थाईलैंड हर मुद्दे से क्यों कटा-कटा रहता है?
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कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए
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पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए
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बौद्ध जीवनशैली और समाज की शांति प्रिय सोच के चलते
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दूसरे देशों से टकराव टालने की नीति
नतीजा – थाईलैंड एक “Low-Key Diplomat” बनकर उभरा है
थाईलैंड ने समय के साथ यह साबित कर दिया है कि कभी-कभी शांति और चुप्पी ही सबसे मजबूत राजनीतिक हथियार बन जाती है। दुनिया जहाँ बयानबाज़ियों और मोर्चाबंदी में उलझी रहती है, वहीं थाईलैंड साइलेंस की डिप्लोमेसी से अपने हित साधता रहता है।
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