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तिब्बती संघर्ष की अमिट आवाज़: दलाई लामा का अडिग सफर

धर्मशाला:
तिब्बती बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा अक्सर स्वयं को एक “साधारण भिक्षु” बताते हैं, लेकिन बीते छह दशकों में, केवल अपनी मुस्कान, करुणा और अडिग विश्वास के सहारे उन्होंने तिब्बत के संघर्ष को वैश्विक मंच पर जीवित बनाए रखा है।

तेनज़िन ग्यात्सो, जो कि 14वें दलाई लामा हैं, 1959 में चीन के खिलाफ हुए एक असफल विद्रोह के बाद हज़ारों तिब्बतियों के साथ भारत निर्वासन में आए। तभी से वह अहिंसक “मध्य मार्ग” का पक्ष लेते रहे हैं — जिसमें तिब्बत की सांस्कृतिक और धार्मिक स्वायत्तता की मांग है, न कि पूर्ण स्वतंत्रता की।

1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उनका एक प्रसिद्ध वाक्य है: “जब भी संभव हो, दयालु बनो। यह हमेशा संभव है।”

चीन की नाराज़गी

दलाई लामा की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता चीन को खटकती रही है। चीन उन्हें “अलगाववादी” कहता है, और एक पूर्व चीनी कम्युनिस्ट नेता ने उन्हें “एक गीदड़ जैसा” और “पाशविक हृदय वाला” तक बताया।

उत्तराधिकारी पर बयान और 90वीं वर्षगांठ

रविवार को वे 90 वर्ष के हो रहे हैं, और इसी अवसर पर उन्होंने अपने संभावित उत्तराधिकारी को लेकर संकेत दिया है।

“Voices for the Voiceless” नामक पुस्तक में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर, यानी “स्वतंत्र विश्व” में जन्म लेगा।
उन्होंने यह भी कहा है कि उत्तराधिकारी एक लड़की भी हो सकती है — या संभव है कि कोई उत्तराधिकारी ना हो।
लेकिन उन्होंने सख्ती से यह कहा है कि चीन द्वारा घोषित कोई भी उत्तराधिकारी तिब्बती जनता द्वारा स्वीकार्य नहीं होगा।

निर्वासन की कहानी

दलाई लामा का जन्म 1935 में ‘ल्हामो धोन्डुप’ नाम से हुआ था, एक किसान परिवार में जो अब चीन के चिंगहाई प्रांत में स्थित है।
महज़ दो वर्ष की उम्र में, उन्हें तिब्बत के 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म माना गया जब उन्होंने अपने पूर्ववर्ती की वस्तुओं की पहचान की।

1950 में चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण स्थापित किया और दलाई लामा को कम उम्र में ही राजनीतिक जिम्मेदारियां निभानी पड़ीं।
1959 में चीनी सेना की कड़ी कार्रवाई के चलते वे भिक्षु के वेश में ल्हासा से भागकर भारत पहुंचे और धर्मशाला को निर्वासित सरकार का केंद्र बनाया।

मध्य मार्ग और राजनीतिक भूमिका से विदाई

1988 में उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग छोड़कर “मध्य मार्ग” की नीति अपनाई — जिसमें धार्मिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता की बात की गई।
2011 में उन्होंने औपचारिक रूप से अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियां निर्वाचित प्रतिनिधियों को सौंप दीं।

आज भी सक्रिय

अब 90 वर्ष की उम्र में भी दलाई लामा, अपने गहरे मैरून और केसरिया वस्त्रों में, धार्मिक प्रवचनों और वैश्विक मुलाकातों में सक्रिय रहते हैं।
हालांकि घुटने की सर्जरी और चलने में तकलीफ ने उनकी गति धीमी की है, उनका उत्साह बना हुआ है।

उन्होंने दिसंबर 2024 में रॉयटर्स को बताया था,
“मेरे एक स्वप्न के अनुसार, मैं 110 वर्ष तक जीवित रह सकता हूं।”

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