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पुतिन के गुप्त टॉर्चर कैंप का खुलासा: रूसी सिपाही जॉर्जी की रूह कंपा देने वाली गवाही

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच अब एक ऐसा सच सामने आया है, जो दुनिया को रूस की सैन्य व्यवस्था के काले चेहरे से रूबरू कराता है। 44 वर्षीय रूसी सैनिक जॉर्जी ने व्लादिमीर पुतिन के गुप्त डिटेंशन कैंप्स का पर्दाफाश करते हुए जो बताया, वो किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं है। यूरोप में शरण मांग रहे इस पूर्व सैनिक का दावा है कि उसे खून से सनी दीवारों वाले एक गुप्त जेल में प्रताड़ना दी गई थी।


कैसे बना एक आम नागरिक युद्ध का मोहरा

मास्को के बाहरी इलाके ल्युबर्त्सी में रहने वाले तीन बच्चों के पिता जॉर्जी युद्ध के खिलाफ थे और दिल की बीमारी जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। बावजूद इसके, अक्टूबर 2022 में उन्हें अचानक एक सैन्य केंद्र से “रिकॉर्ड अपडेट” के बहाने बुलाकर सीधा यूक्रेन युद्ध के लिए भेज दिया गया। उन्हें उम्मीद थी कि मेडिकल कारणों से छूट मिलेगी, लेकिन बिना जांच या सुनवाई के उन्हें ड्यूटी ऑर्डर थमा दिया गया।


यूक्रेन में मौत की जमीन पर

जॉर्जी को सीमित ट्रेनिंग के बाद नवंबर में यूक्रेन भेजा गया, जहां उन्हें युद्ध की भयावहता का साक्षात्कार हुआ। कीचड़, बर्बादी और डर से घिरे सैनिकों के बीच एक अफसर ने कहा, “वापस जाना है तो बॉडी बैग में जाओगे।” ऐसे हालात में जॉर्जी ने दो बार भागने की कोशिश की, लेकिन दोनों बार पकड़े गए और इस दौरान उन्हें दो दिल के दौरे भी आए।


गुप्त जेल ‘रोज़सिप्ने’ और टॉर्चर की कहानी

भागने के आरोप में उन्हें जिस गुप्त जेल में रखा गया, उसका नाम था रोज़सिप्ने—एक पुराना यूक्रेनी बॉर्डर पोस्ट जिसे रूसी सेना ने गुप्त डिटेंशन सेंटर में बदल दिया था। यहां कैदियों को “पुनः शिक्षा” के नाम पर पीटा जाता था। जॉर्जी के मुताबिक, दीवारों पर खून के धब्बे थे जिन्हें साफ करने के लिए बंदियों को मजबूर किया जाता था।


पुतिन सरकार का इनकार, पर सबूत सामने

रूसी सरकार अब भी ऐसे कैंप्स के अस्तित्व को नकारती है, लेकिन स्वतंत्र मीडिया और मानवाधिकार संगठन ‘फेयरवेल टू आर्म्स’ जैसे समूहों ने जॉर्जी की गवाही को सत्यापित किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक रूस में लगभग 16,000 सैनिक ऐसे हैं जिन्होंने ड्यूटी से इनकार किया है—जिनमें से कई को इसी तरह की सजा दी गई है।


नरक से लौटे सिपाही की चेतावनी

जॉर्जी मई 2024 में किसी तरह भागकर यूरोप पहुंचे और अब शरण की मांग कर रहे हैं। उनकी कहानी न केवल युद्ध की अमानवीयता को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि असहमति रखने वाले सैनिकों को किस हद तक दबाया जा रहा है।

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