ढाका: बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा मोड़ तब आया जब देश की सुप्रीम कोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी पार्टी का चुनावी पंजीकरण बहाल करने का आदेश दिया। यह वही पार्टी है जिसे पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के शासनकाल में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोपों के चलते चुनाव प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट के अपील खंड, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सैयद रिफात अहमद कर रहे थे, ने रविवार को चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह दक्षिणपंथी इस्लामिक पार्टी का पंजीकरण पुनः मान्य करे। अदालत ने साथ ही यह स्पष्ट किया कि पार्टी को “तराजू” चुनाव चिह्न allot किया जाए या नहीं, यह चुनाव आयोग के विवेक पर निर्भर करेगा।
जमात की वापसी के पीछे का घटनाक्रम
2013 में उच्च न्यायालय के आदेश पर जमात-ए-इस्लामी का पंजीकरण रद्द किया गया था। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दिया था क्योंकि पार्टी ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का समर्थन किया था। लेकिन अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद, जमात ने 2013 के फैसले की पुनरावलोकन याचिका दायर की थी। उसी वर्ष अंतरिम सरकार ने पार्टी पर से प्रतिबंध हटा दिया, और अब सुप्रीम कोर्ट ने पंजीकरण भी बहाल कर दिया है।
जमात का स्वागत, विपक्ष को बढ़त
पार्टी के वरिष्ठ वकील मोहम्मद शिशिर मनीर ने अदालत के निर्णय को “ऐतिहासिक जीत” करार दिया और उम्मीद जताई कि इससे देश में लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि बांग्लादेश की जनता को अब हर वैकल्पिक राजनीतिक विकल्प मिले।”
यह फैसला ऐसे समय आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने इसी सप्ताह जमात के एक शीर्ष नेता ATM अज़हरुल इस्लाम को भी बरी कर दिया, जिन पर 1971 में युद्ध अपराधों का आरोप था। अब उनके खिलाफ मानवता के खिलाफ अपराध का मुकदमा खत्म हो गया है।
हसीना की पार्टी गायब, BNP और जमात को फायदा
अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली सरकार ने हाल ही में शेख हसीना की पार्टी, अवामी लीग को भंग कर दिया था। इस फैसले के बाद अब बांग्लादेश की राजनीति में मुख्य भूमिका में BNP (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) और जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियाँ उभरकर सामने आ रही हैं। BNP की नेता खालिदा जिया अब एक सशक्त विपक्ष की अगुवाई कर रही हैं।
क्या संकेत दे रही है ये राजनीतिक करवट?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश की राजनीतिक दिशा में संभावित बड़े बदलावों का संकेत माना जा रहा है। जहां एक ओर एक पुरानी प्रतिबंधित पार्टी को फिर से मान्यता मिल रही है, वहीं दूसरी ओर अवामी लीग जैसी स्थापित पार्टी की अनुपस्थिति सत्ता संतुलन को पूरी तरह बदल सकती है।
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