भारत की संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अब देश की शैक्षणिक संस्थाएं भी स्पष्ट रुख अपना रही हैं। हाल ही में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी ने राष्ट्रहित में एक अहम कदम उठाते हुए तुर्की और अजरबैजान के 23 विश्वविद्यालयों के साथ अपने अकादमिक संबंध समाप्त करने की घोषणा की है।
पाक का साथ देने वालों से दूरी
भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया सैन्य तनाव के दौरान तुर्की और अजरबैजान ने पाकिस्तान के पक्ष में खुला समर्थन जाहिर किया था। इन दोनों देशों ने पाकिस्तान को सैन्य संसाधनों की आपूर्ति कर भारत के खिलाफ उसकी रणनीति को सहयोग दिया। इसके चलते भारत में इन देशों को लेकर आक्रोश गहराता जा रहा है।
हालांकि, भारत ने तुर्की में आए विनाशकारी भूकंप के समय मानवता दिखाते हुए राहत सामग्री भेजी थी, लेकिन जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा की आई, तो इन देशों के रवैये ने कई सवाल खड़े कर दिए।
“राष्ट्र सर्वोपरि”, कुलाधिपति का स्पष्ट संदेश
चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति और राज्यसभा सांसद सतनाम सिंह संधू ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा,
“हमारा विश्वविद्यालय हमेशा ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के अनुरूप चलता है। तुर्की और अजरबैजान द्वारा आतंक को परोक्ष समर्थन दिए जाने के कारण हमने उनके साथ सभी शैक्षणिक साझेदारियों को समाप्त कर दिया है।”
उन्होंने आगे कहा, “राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस नीति के अनुरूप है जिसमें आतंकवाद और उसके समर्थकों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।”
आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता का प्रतीक
यह कदम सिर्फ एक विश्वविद्यालय का निर्णय नहीं, बल्कि यह उस व्यापक जनभावना का प्रतिनिधित्व करता है जो अब आतंकवाद और उसके सहयोगियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की मांग कर रही है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी का यह निर्णय एक सशक्त संदेश है कि भारत अब केवल सैन्य मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक और शैक्षणिक स्तर पर भी सख्ती से जवाब देने के लिए तैयार है।
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